वाराणसी
इमाम अली की याद में दालमंडी से उठा जुलूस
वाराणसी की फिजा में गूंजी सदा ए या अली, अजादारों ने की सीनाजनी
वाराणसी। शिया मुसलामानों के पहले इमाम और पैगंबर साहब के दामाद इमाम अली की शहादत की याद में दालमंडी से सोमवार की सुबह नमाज के बाद जुलूस उठाया गया। जुलूस उठने से पहले मौलाना ने इमाम अली के तलवार लगाने के उस वाकये को बयान किया जो इस्लाम में पहली आतंकी घटना थी। जब अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम ने जहर बुझी तलवार से इमाम अली के सिर पर हमला किया था।
इस हमले के बाद इमाम अली की शहादत 21 रमजान 40 हिजरी में हुई थी। शिया मुसलमान 19 रमजान से 21 रमजान तक इमाम अली का गम मनाते हैं। दालमंडी के अलावा जव्वादिया अरबी कालेज में भी मजलिस के बाद तुर्बत उठाई गई। फिजा में या अली की सदाएं गूंजती रही।
मस्जिदे कूफा में हुआ हमला
दालमंडी के चहमामा इलाके से अपनी पुरानी रवायतों के अनुसार हजरत अली की याद में तुर्बत का जुलूस उठाया गया। जुलूस उठने से पहले मौलाना बाकर हुसैन ने मजलिस पढ़ी। उन्होंने कहा 40 हिजरी में इमाम अली ईराक के शहर कूफा में रहते थे।
मस्जिदे कूफा में रोजाना नमाज पढ़ते थे। 40 हिजरी की 19 रमजान की सुबह जब वो सुबह की नमाज पढ़ रहे थे और सजदे में थे उसी समय उनके दुश्मनों ने मस्जिद के अंदर नमाज की हालत में इमाम अली पर जहर बुझी तलवार से हमला कर दिया। ये सुनकर वहां मौजूद लोग जारो कतार रोने लगे।
अपने कातिल को खुद जगाया
मौलाना बाकर हुसैन ने आगे पढ़ा- 19 रमजान सन 40 हिजरी को जब इमाम अली फज्र की नमाज पढ़ने के लिए कूफा की मस्जिद में पहुंचे तो उनका कातिल अब्दुर्रहमान मस्जिद में सो रहा था। उन्होंने उसे जगाया और कहा की नमाज का वक्त है सोना कैसा।
इसके बाद उस आतंकी ने उनके ऊपर जहर बुझी तलवार से हमला किया। जिसके बाद उनके सिर से खून निकलने लगा। लोगों ने कातिल को पकड़कर अली के सामने पेश किया पर उन्होंने उस वक्त भी उसके जिसमे बंधी रस्सी खुलवा दी। ऐसे में हमें इमाम अली की जिंदगी और मौत दोनों से सीख लेनी चाहिए।
अंजुमन हैदरी ने की नौहाख्वानी वा मातम
जुलूसों उठने पर अंजुमन हैदरी चौक बनारस ने नौहाख्वानी वा मातम किया। नौहा- फलक पर सुबह का तारा तुलु (निकलता) है। खुदा के सजदे में साजिद शहीद होता है। पड़े हैं गश में अली खून में नहाए हुए, के जुल्फेकार के साये में शेर सोया है।
पुकारते हैं नमाजी अली शहीद हुए। जहां में हश्र बपा है हर एक रोता है; की सदा के साथ जुलूस आगे बढ़ा। जुलूस अपने कदीमी रास्तों दालमंडी, नई सड़क, शेख सलीम फाटक, काली महल, पितृकुण्डा, मुस्लिम स्कूल होता हुआए दरगाह फातमान में समाप्त हुआ।
जव्वादिया अरबी कालेज में हुई मजलिस, उठी तुर्बत
इधर जव्वादिया अरबी कालेज, प्रह्लादघाट में मजलिस का आयोजन किया गया। यहां मजलिस को मौलाना हैदर अब्बास ने खेताब फरमाया। उन्होंने पढ़ा कि इमाम अली जब जख्मी हालत में घर पहुंचे तो कोहराम मच गया। उनकी बेटियां जनाबे जैनब और जनाबे कुलसूम की चीखें निकल गयीं।
इमाम अली इस दर्द से तीन दिन तक तड़पते रहे और 21 रमजान की सुबह उनकी शहादत हो गई। ये सुनकर वहां मौजूद लोग रोने लगे। बाद मजलिस तुर्बत उठाई गई।
