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चन्दौली

आचार्य प्रमोद कुमार चतुर्वेदी की कविता में उम्मीद की हुंकार — ‘फिर खिलेंगे फूल उपवन में’

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फिर खिलेंगे फूल उपवन में हमें  विश्वास है
आचरण की शुद्धता का हां हमें आभास है ।
कर्म और पुरुषार्थ पर हमें पूर्ण विश्वास है।
जाति, वर्ग, धर्म भेद भिन्नता का परिहास है।
फिर खिलेंगे फूल उपवन में हमें विश्वास है।
बंद होठों की व्यथा अपनी कथा कहती रही हैं।
मूक दर्शक भावना सब कुछ मगर सहती रही है।
कामनाओं के हिमालय में जगी फिर आस है।
फिर खिलेंगे फूल उपवन में हमें विश्वास है।
सारथी बन कौन आएगा भला अब रणक्षेत्र में ।
अब कृष्ण अर्जुन भी कहां है वक्त के कुरुक्षेत्र में।
अब नाव  पर केवट नहीं अब कसमकश में स्वास है।
फिर खिलेंगे फूल उपवन में हमें विश्वास है।
पात्रता का बोध किसको अंधे युग की त्रासदी है।
हैं अभागे क्षण उन्हें अब ढो रही पूरी सदी है।
राजनेता कर रहे नियम कानून का उपहास है।
है इधर पतझड़ उधर छाया मधुमास है।
फिर खिलेंगे फूल उपवन में हमें विश्वास है।।

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