गोरखपुर
अन्तर जागरण का सांस्कृतिक प्रतीक है मकर संक्रांति पर्व : सर्वेदु कृष्ण
गोलाबाजार (गोरखपुर)। उठना और जागरण यह दोनो शब्द देखने में समान लगते हैं, पर भारतीय चेतना में इनके अर्थ एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। उठना देह की यांत्रिक सक्रियता है, वह गति जो मनुष्य को नींद से कर्म तक तो ले आती है, पर कई बार विवेक को पीछे छोड़ देती है। आज की वैश्विक सभ्यता इसी उठने की अवस्था में है। उत्पादन, उपभोग और तकनीकी प्रगति के पहिये तेज़ी से घूम रहे हैं, किंतु चेतना की आंखें अक्सर बंद हैं। इसके विपरीत जागरण आत्मा का प्रस्फुटन है। इसमें मनुष्य केवल सक्रिय नहीं होता, बल्कि अपने अस्तित्व, अपने कर्म और उनके प्रभावों के प्रति सजग होता है। शिष्य गोरखनाथ और गुरु मच्छेंद्रनाथ का प्रसंग हमें बताता है कि जागरण की परंपरा किसी सत्ता या पदानुक्रम से नहीं बल्कि विवेक और उत्तरदायित्व से आती है।
सिद्धार्थ ने संसार की नश्वर अवस्थाओं को देख कर बुद्धत्व को पा लिया, तो कलिंग के रक्तपात ने अशोक के भीतर करुणा की मंदाकिनी बहा दी, जिससे युद्ध-घोष सदा के लिए धम्म-घोष में परिवर्तित हो गया। मादा क्रौंच के आर्तनाद ने वाल्मीकि के भीतर आदि-कवि को जन्म दिया, तो अपनी जीवनसंगिनी के विछोह ने दशरथ मांझी के भीतर वह अदम्य श्रम जगाया कि अभेद्य पर्वतों ने भी नतमस्तक होकर मार्ग दे दिया।

मकर संक्रांति का पर्व इसी अंतर्जागरण का सांस्कृतिक प्रतीक है। जब सूर्य धनु से निकलकर मकर की मर्यादा में प्रवेश करता है, तो वह केवल आकाशीय स्थिति नहीं बदलता, बल्कि जीवन की तासीर बदल देता है। उत्तरायण प्रकृति के आलस से सृजन की ओर बढ़ने का क्षण है भय से भरोसे की यात्रा अवसाद से आशा की यात्रा।
शिशिर की ठिठुरन में सूर्य की पहली उत्तरायणी किरण यह भरोसा देती है कि अंधकार चाहे कितना भी घना हो, उजाला लौटने को बाध्य है।

लोकमानस में पतंगें, तिल, खिचड़ी और उत्सव जीवन के गूढ़ रूपक बन जाते हैं वह भी जगाते हैं आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें सिखाती हैं कि तेज़ हवाएं हमें गिराने नहीं, बल्कि सही संतुलन हो तो और ऊंचा उठाने आती हैं.।. आकाश की इस एयर ट्रैफिक जाम के मध्य ही अपने उन्नयन का रास्ता बनाना है हाथ में डोर का संयम और आंखों में आकाश का स्वप्न यही तो जीवन का संतुलन है।
शिशिर को हाशिए पर धकेलने का सूर्य सामर्थ्य प्रारंभ हो चुका है। बयार में एक अदृश्य करवट है। ऋतुराज बसंत अभी आए नहीं हैं, पर उनके पदचाप अब सुनाई दे रहे हैं। उन्हें गिनने के लिए कैलेंडर नहीं, बस हथेली की उंगलियों के पोर ही काफी हैं।
