गोरखपुर
अधूरे सपनों का भारत: क्या फिर जन्म लेंगे भगत, आज़ाद और बोस
गोरखपुर। भारत एक ऐसा देश जिसे कभी “सोने की चिड़िया” कहा गया, जहाँ की मिट्टी में बलिदान की खुशबू रची-बसी है, जहाँ हर कण में स्वतंत्रता सेनानियों का खून समाया हुआ है। लेकिन आज जब हम अपने चारों ओर नजर डालते हैं, तो एक सवाल मन को झकझोर देता है क्या यही वह भारत है, जिसका सपना हमारे अमर बलिदानियों ने देखा था?
शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद और नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जिस भारत की कल्पना की थी, वह केवल अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति तक सीमित नहीं थी। उनका सपना एक ऐसे भारत का था, जहाँ हर नागरिक स्वतंत्र हो, समानता हो, भाईचारा हो, और राष्ट्र सर्वोपरि हो। लेकिन आज का परिदृश्य इस आदर्श से कोसों दूर दिखाई देता है।
आजादी के बाद हमने विकास के कई आयाम छुए, विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और अर्थव्यवस्था में भारत ने नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं। लेकिन इस चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है—राजनीतिक स्वार्थ, सामाजिक विघटन और नैतिक पतन। आज देश में भाईचारे की जगह वैमनस्य, सेवा की जगह स्वार्थ, और राष्ट्रभक्ति की जगह सत्ता की भूख ने ले ली है।
राजनीतिक दल, जो लोकतंत्र के स्तंभ माने जाते हैं, वे आज विभाजन की राजनीति का माध्यम बनते जा रहे हैं। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर लोगों को बांटकर सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ी जा रही हैं। यह वही भारत है जहाँ “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना जन्मी थी, लेकिन आज अपने ही देशवासी एक-दूसरे के खिलाफ खड़े किए जा रहे हैं।
सबसे दुखद पहलू यह है कि देश का आम नागरिक, जो इस लोकतंत्र की असली ताकत है, वह आज अपने ही देश में असहाय महसूस कर रहा है। एक ओर महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता की मार है, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार और कुशासन की बेड़ियाँ। ऐसा प्रतीत होता है मानो हर जन्म लेने वाला बच्चा किसी न किसी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है—एक ऐसा कर्ज जो केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है।
हमारे बलिदानियों ने जिस “राम राज्य” की परिकल्पना की थी, वह न्याय, सत्य और धर्म पर आधारित था। लेकिन आज का भारत कहीं न कहीं “रावण और कंस” के प्रतीकों की ओर बढ़ता नजर आता है—जहाँ अहंकार, लालच और अन्याय का बोलबाला है। सत्ता के गलियारों में बैठे लोग जनता के सेवक कम और शासक अधिक बनते जा रहे हैं।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या हमारे अमर बलिदानी आज होते तो क्या वे इस स्थिति को स्वीकार करते? क्या भगत सिंह, जिन्होंने 23 साल की उम्र में हँसते-हँसते फांसी का फंदा चूमा, इस भारत को देखकर गर्व महसूस करते? क्या चंद्रशेखर आज़ाद, जिन्होंने आखिरी गोली खुद पर चलाकर आत्मसम्मान की मिसाल कायम की, आज की राजनीति को देखकर संतुष्ट होते?शायद नहीं।
आज जरूरत है आत्ममंथन की। जरूरत है यह समझने की कि देश केवल सरकार से नहीं चलता, बल्कि नागरिकों की सोच और व्यवहार से भी चलता है। अगर हम सच में अपने बलिदानियों के सपनों का भारत बनाना चाहते हैं, तो हमें खुद से शुरुआत करनी होगी।
हमें अपने भीतर की नफरत को खत्म करना होगा, अपने दिलों में भाईचारे की भावना को फिर से जागृत करना होगा। हमें यह समझना होगा कि धर्म, जाति और भाषा से ऊपर उठकर हम सभी भारतीय हैं। यही वह भावना है जो हमें एक सशक्त राष्ट्र बना सकती है।
राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि सत्ता केवल एक माध्यम है, लक्ष्य नहीं। उनका कर्तव्य है देश की सेवा करना, न कि उसे बांटना। अगर राजनीति स्वच्छ और पारदर्शी होगी, तो देश अपने आप प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा।
शिक्षा व्यवस्था को भी इस दिशा में अहम भूमिका निभानी होगी। बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों और देशभक्ति की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। जब नई पीढ़ी जागरूक और जिम्मेदार बनेगी, तभी देश का भविष्य सुरक्षित होगा।
मीडिया और समाज के अन्य प्रभावशाली वर्गों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उन्हें सच्चाई को उजागर करना होगा, जनता को जागरूक करना होगा और देशहित को सर्वोपरि रखना होगा।
आज का भारत एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता हमें उसी दिशा में ले जाता है जहाँ स्वार्थ, विभाजन और पतन है। दूसरा रास्ता हमें उस भारत की ओर ले जाता है जिसका सपना हमारे बलिदानियों ने देखा था—एक ऐसा भारत जो मजबूत, समृद्ध और एकजुट हो। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम कौन सा रास्ता चुनते हैं। क्या फिर से जन्म लेंगे भगत सिंह, आज़ाद और बोस?शायद नहीं… क्योंकि इतिहास खुद को दोहराता नहीं, वह केवल प्रेरणा देता है।
लेकिन अगर हम चाहें, तो हर घर से एक भगत सिंह, हर दिल से एक आज़ाद और हर सोच से एक सुभाष पैदा हो सकता है। जरूरत है केवल उस जज्बे को जगाने की, उस आग को फिर से प्रज्वलित करने की, जो कभी हमारे बलिदानियों के दिलों में जलती थी।
आज समय है उस अधूरे सपने को पूरा करने का। आज समय है उस भारत को बनाने का, जिस पर हमारे शहीदों की आत्मा को गर्व हो।bक्योंकि अगर हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
