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मूल्यपरक और सेवा की राजनीति में पंडित जी की थी गहरी आस्था, पं कमलापति त्रिपाठी की जयंती पर वर्चुअल व्याख्यान

वाराणसी। पंडित कमलापति त्रिपाठी जयन्ती समारोह समिति की ओर से शनिवार को ॠषिपंचमी तिथि पर वर्चुअल व्याख्यान माला के अन्तर्गत ‘पंडित जी और राष्ट्र के लिये उनका अवदान’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी। इसके पूर्व पंडित जी और समारोह समिति के संस्थापक रहे स्व. पंडित रामप्रवेश चौबे के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर दीप प्रज्वलन हुआ।
इस अवसर पर वक्ताओं और श्रोताओं का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के आयोजक एवं उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व महासचिव सतीश चौबे ने कहा कि सन 1972 से ऋषि पंचमी पर पंडित जी का जन्म दिन मनाने की चल रही अविच्छिन्न परम्परा में कुछ अपरिहार्य कारणों से पहली बार ऑनलाइन वर्चुअल नियोजित करना पड़ा है। हम सभी वक्ताओं और श्रोताओं का स्वागत करते हैं और अगले साल इसको भब्य रूप से मनाने का संकल्प दोहराते हैं।
परिचर्चा में अपना विचार रखते हुये वरिष्ठ पत्रकार और नेहरू ग्रामोदय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर राममोहन पाठक ने कहा कि पंडित कमलापति त्रिपाठी ॠषितुल्य थे। उनका व्यक्तित्व विशाल और विलक्षण था, मूल्यपरक और सेवा की राजनिति में उनकी गहरी आस्था थी। उनका विकास बनावटी दिखावटी नही बल्कि जमीनी था, उन्होंने आजीवन जन सेवा को आगे रखकर कर काम किया और देश और प्रदेश में विकास के नये प्रतिमान स्थापित किये थे, ऐसे देवतुल्य महामानव को उनकी 116 वीं जयन्ती पर सादर नमन करते हैं।
डॉ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीनिवास ओझा ने कहा कि पंडित जी के व्यक्तित्व में ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ की छबि दिखती थी। एक ओर राजनैतिक जीवन में वो निस्पृह भाव से मानव सेवा के पुजारी के रूप में दिखते हैं तो वहीं साहित्य, लेखन, पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी विद्वता और पांडित्य की ध्वजा को वो फहराते दिखते हैं। शिक्षा जगत में उनका योगदान अविस्मरणीय है, खास कर संस्कृत शिक्षा के तो वे महान संरक्षक थे, आज का संम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय उसका जीवन्त उदाहरण है।
परिचर्चा के तीसरे वक्ता महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर आनिल कुमार उपाध्याय ने कहा कि पंडित जी एक सर्वांगीण सोच वाले जन नेता, बेहद जागरूक पत्रकार, अद्वितीय लेखक और मूल्य आधारित राजनिति के पुरोधा थे। सत्य उनके उत्थान का हिस्सा था जिसे उन्होंने महात्मा गांधी, आचार्य नरेन्द्र, पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू जैसे नेताओं संसर्ग से प्राप्त किया था। आज की राजनीति में पंडित जी जैसे विशाल व्यक्तित्व के आस-पास भी कोई नेता दूर-दूर दिखाई नहीं देता, सच्चे अर्थों में वो महामानव थे।
चर्चा के अगली कड़ी में राजीव गांधी स्टडी सर्किल के नेशनल कोऑर्डिनेटर प्रोफेसर सतीश कुमार राय ने कहा पंडित कमलापति त्रिपाठी, मूल्य आधारित वैचारिकी की विरासत के सिद्ध पुरुष थे, जिन्हें काशी अपना गौरव मानती थी। पंडित जी काशी की संस्कृति के ब्रांड एंबेसडर, उनका व्यक्तित्व आधुनिकता और परंपरा का एक अद्भुत समन्वय था। गांधी युग की ऐसी उपज थे, जिन्होंने 15 वर्ष के जीवन में जेल यात्रा के साथ देश सेवा के जिस महाव्रत को अपनाया था, उसे उन्होंने आजीवन निभाया, जीवन पर्यंत कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव आए परंतु उन्होंने मूल्यों की राजनीति और अपनी मातृ संस्था कांग्रेस को हमेशा अपना इष्ट मानते हुये सरष आंखो पर रखा। सही मायने में पंडित कमलापति त्रिपाठी जी भारतीय राजनीति के सुकरात थे, जो मौत को नजदीक से देखने के बाद भी देश और देशवासियों को कुछ बेहतर देने के लिए कृत संकल्पित रहे। ऐसे दार्शनिक महामानव को राजनिति बार-बार प्राप्त नहीं कर पाती। यह देश का सौभाग्य है, पंडित जी जैसा महान व्यक्तित्व काशी की धरती पर अवतरित हुआ। आज उनकी एक सौ सोलहवीं जयंती पर उनके द्वारा दिखाए गए रास्तों पर चलने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए।
परिचर्चा के अंत में सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करते हुए वरिष्ठ नेता विजय शंकर पांडेय ने कहा कि पंडित जी के व्यक्तित्व और कृतित्व तथा उनके जीवन के विभिन्न आयाम पर होने वाली लगातार सप्ताह व्यापी इस परिचर्चा में भाग लेने वाले सभी विद्वानों और वर्चुअल रूप से जुड़कर व्याख्यानमाला को सफल बनाने वाले सभी लोगों का हृदय से धन्यवाद। परिचर्चा का प्रस्तुतीकरण विजय कृष्ण राय, संचालन बैजनाथ सिंह, तकनीकी संयोजन पुनीत मिश्रा और वैभव त्रिपाठी, कार्यक्रम का संयोजन मनीष चौबे ने किया।
इस अवसर पर शहर कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष विजय शंकर मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेंद्र शर्मा, दिलीप चौबे, आनंद मिश्रा, सतीश तिवारी, मयंक चौबे, विपिन मेहता, विनीत चौबे आदर्श मिश्रा, कन्हैया गुप्ता, पंकज चौबे, गौरव तिवारी, आदर्श चौबे, ईशांक चौबे आदि ने भी सहभाग किया।