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आजमगढ़

महाराष्ट्र में 58वें निरंकारी संत समागम का भव्य समापन

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आजमगढ़। भक्ति और आध्यात्मिकता की सुगंध फैलाते हुए महाराष्ट्र में आयोजित 58वें वार्षिक निरंकारी संत समागम का समापन हो गया। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने समागम के अंतिम दिन लाखों श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मिक उन्नति में निहित है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन इसलिए श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इसमें आत्मज्ञान प्राप्त करने की क्षमता है। परमात्मा निराकार है, और उसे जानना ही मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए।

सतगुरु माता जी ने जीवन को एक वरदान बताते हुए कहा कि हर पल परमात्मा से जुड़कर जीने से ही सच्ची शांति और संतोष मिल सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भक्ति और जिम्मेदारियों का संतुलन बनाकर जीवन को सही दिशा में ले जाना आवश्यक है। जीवन में केवल भक्ति में लीन रहना या केवल भौतिक उपलब्धियों के पीछे भागना, दोनों से ही संतुलित जीवन संभव नहीं है।

भक्ति के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि ब्रह्मज्ञान केवल जानने के लिए नहीं, बल्कि उसे अपनाने के लिए है।

समागम में विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से भक्ति और सेवा का संदेश दिया गया। इसमें बहुभाषी कवि दरबार का आयोजन हुआ, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आए 21 कवियों ने मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी में अपने काव्य पाठ से मिशन का संदेश फैलाया। इसके अलावा समागम में निरंकारी प्रदर्शनी मुख्य आकर्षण का केंद्र रही, जहां मिशन की विचारधारा, इतिहास और समाज कल्याण की गतिविधियों को दर्शाया गया।

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स्वास्थ्य सेवाओं के तहत कायरोप्रैक्टिक शिविर, होम्योपैथिक डिस्पेंसरी और 60 बिस्तरों वाला अस्थायी अस्पताल भी बनाया गया, जहां श्रद्धालुओं को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की गईं।

लंगर व्यवस्था में हजारों श्रद्धालुओं के लिए 24 घंटे भोजन की व्यवस्था की गई। इसमें हर समय 72 क्विंटल चावल पकाने और एक समय में 70 हजार लोगों को भोजन कराने की क्षमता थी। श्रद्धालुओं की सेवा के लिए समर्पित टीमों ने इस समागम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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