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पूर्वांचल

जौनपुर के सेनापुर गांव की आजादी दिलाने में है अहम योगदान

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स्वतंत्रता दिवस पर विशेष –

मेरठ में 1857 में इस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ चिनगारी भड़की तो उसकी आंच जौैनपुर के डोभी में भी महसूस की गई। क्रांति की रोटी यहां पहुंची हो या नहीं लेकिन यहां के रणबांकुरों ने अंग्रेजों से जबरदस्त लोहा लिया। लंबी लड़ाई के बाद सीधे मुकाबले में सफल नहीं होने पर कंपनी के अफसरों ने धोखे से समझौते के लिए सेनपुरा बुलाया बुलाया और 22 रणबांकुरों को फांसी दे दी। उसके बाद उनके सहयोगियों का दमन किया गया।

देश को आजादी दिलाने के बारे में जब भी बात की जाती है तो हमेशा बरबस ही सेनापुर के उन 22 वीर अमर सपूतों की शाहदत जुबां पर आ ही जाती है। क्रांतिकारियों की भरती कहे जाने वाली तहसील के सेनापुर गांव में अंग्रेज जालिमों द्वारा गांव के बाहर एक आम के बगीचे में पेड़ पर लटका फांसी देने के बाद गोलियों से उनकी शरीर को छलनी कर दिया गया। आज भी इन शहीदो की वीरगाथाएं लोगों के दिलों दिमाग में तरोताजा बनी हुई है। यहां तक की गांव के बुजुर्ग अपने नाती-पोते को भी आजादी की कहानी सुनाते हैं ताकि उनके अंदर भी देश प्रेम की भावना जागृत हो।

गांव के वरिष्ठ नागरिकों में का कहना है कि भारतीय सैनिकों की इस गांव में लंबे समय तक छावनी रही है। इसी से इस गांव का नाम सेनापुर पड़ गया। जबकि इसके पहले गांव को माघोपुर नाम से जाना जाता था।बता दें कि, जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर पूर्वोत्तर शहीदों का सेनापुर गांव स्थित है। जब अंग्रेज जालिमों से के बेड़ियों से जकड़ी भारत माँ कराह रही थी तो उस समय अंग्रेजों के जुल्मी सितम को लेकर डोभी क्षेत्र के रणबांकुरे ने बगावत के सुर बुलंद करना शुरु कर दिया।

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19‌वीं सदी के पूर्वीद्ध अंग्रेज शासन द्वारा लगाये गये कर से डोभी की जनता में जबरदस्त आक्रोश था। 5 जून 1857 को बगावत की चिंगारी शोला बनकर उस समय धधक उठी थी। जब जौनपुर सैनिक छावनी में यह खबर फैली कि वाराणसी के सैनिक छावनी में निहत्थे सिख सैनिकों पर अंग्रेज जालिमों ने अंधाधुंध फायरिंग कर लोगों की मौत के घाट उतार दिया है।

सूचना के बाद यहां सिख सैनिकों ने अंग्रेज कमान्डिंग आफीसर को गोली मारकर मौत की नीद सुला दिया। इस हत्याकांड‌ को लेकर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट कुप्पे जेल की और भागने लगा, जिसे विद्रोहियों ने दौड़ा कर मौली मारकर हत्या कर दिया। फिर क्या था पूरे जनपद में विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी। डोभी के रघुवंशियों का रिश्ता बिहार के आरा जनपद के जगदीशपुर के लोगों से पीड़ियो से चला आ रहा है।

आरा बिहार के जगदीशपुर निवासी कुंवर सिंह के आह्वान पर डोभी के रघुवंशी भी इस बगावत की जंग में कूद पड़े। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि जनता अंग्रेजों व उनका साथ देने वालों पर हमलावर हो गयी। इस आन्दोलन को एक संगठित बनाकर लड़ाई को चार दिया गया और आन्दोलन कारियों ने आजमगढ़ वाराणसी मार्ग पर कब्जा जमा लिया। इस मार्ग पर अंग्रेजी सैनिकों के मार्ग अवरुद्ध कर वाराणसी की रियासत को फतह करने हेतु कुच कर दिये। जिसकी भनक अंग्रेजों को लग गयी तो अंग्रेज शासकों ने विद्रोहियों से निबटने की तैयारी कर लिया।

पहली मुठभेड़ आन्दोलन कारियों को भारी क्षति उठानी पड़ी। उसके बाद बगावतियो का जनसैलाब उमड़ पड़ा। जिसका नतीजा यह हुआ कि वाराणसी-आजमगढ़ पर कब्जा जमा लिया। ब्रिटश शासन के सामने अस्तित्व का संकट गहरा गया। उस समय एक भारतीय रियासत ने अंग्रेजों को सैनिक सहायता उपलब्ध करा दिया गया। उसके बावजूद डोभी के भारी जनिवरोध को देखते हुए अंग्रेज दबाव में आ गये।

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सात क्रान्तिकारियों का नहीं है नाम दर्ज –

इतिहास कारों ने इतिहास लिखते समय सात क्रान्तिकारियों के नाम लिखना भी भूल गये। सेनापुर फांसी पर लटकाये गये 22 शहीदों में सिर्फ 15 शहीदों का नाम इतिहास के पन्नों पर नाम अंकित है। सेनापुर में बने शहीद स्तंभ भी 15 नहीयो का नाम अंकित है। जिसमें शिलापट्ट पर रामदुलार सिंह, शिवराम अहीर, यदुवीर सिंह सियत सिंह, अभिलाष सिंह, ठाकुर सिंह, किशुन अहीर, माधव सिंह वित्वेवर सिंह, राम भरोस सिंह एवं छांगुर सिंह समेत 15 नाम अंकित है। जबकि सात शहीदों के बारे में किसी को कोई पता नहीं है।

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