गाजीपुर
चार माह के मासूम और महिला की मौत के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था कटघरे में
गाजीपुर (जयदेश)। विधानसभा में जिस राजकीय मेडिकल कॉलेज के जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं की सराहना उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा की गई थी, वही अस्पताल अब मरीजों और उनके परिजनों के लिए परेशानी और लापरवाही का प्रतीक बनता जा रहा है। इलाज, दवाइयों और चिकित्सकीय निगरानी के अभाव में हो रही लगातार मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल के दिनों में हुई दो मौतों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं या फिर लापरवाही के सहारे अपनी किस्मत पर छोड़ दिए जाते हैं।
राजकीय मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन चार से पांच हजार मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। दूर-दराज के गांवों से लोग बेहतर उपचार की उम्मीद में यहां आते हैं, लेकिन कई बार यही उम्मीद उनके लिए मजबूरी बन जाती है। आरोप है कि चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की लापरवाही के कारण मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता और उन्हें इसकी कीमत अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ती है।

26 फरवरी को दिलदारनगर के महना गांव निवासी सतीश अपने चार माह के बेटे को उल्टी, दस्त और बुखार की शिकायत होने पर लगभग 30 से 35 किलोमीटर का सफर तय कर जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। ओपीडी काउंटर से पर्ची लेने के बाद जब वह डॉक्टर को दिखाने पहुंचे तो उन्हें नंबर आने का इंतजार करने को कहा गया। करीब डेढ़ घंटे तक मासूम तड़पता रहा, लेकिन उसकी गंभीर स्थिति पर किसी का ध्यान नहीं गया और अंततः उसने मां की गोद में ही दम तोड़ दिया।
यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि पांच मार्च को शादियाबाद के खड़वाडीह निवासी मुकेश कुमार अपनी मां ऊषा को सीने में दर्द और सांस लेने में परेशानी की शिकायत के चलते महिला वार्ड में भर्ती कराए। आरोप है कि करीब चार घंटे तक महिला वार्ड में उन्हें समुचित उपचार नहीं मिला और तड़पते हुए ऊषा की मौत हो गई।
परिजनों के हंगामे के बाद विभाग ने लापरवाही मानते हुए तीन कर्मचारियों को निलंबित कर दिया। वहीं मासूम की मौत के मामले में तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर जांच कराई जा रही है। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
