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गोरखपुर

अयोध्या की दिव्य झांकी में डूबा गोरखपुर, सप्तम दिवसीय श्रीराम कथा में भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

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गोरखपुर में आयोजित श्रीराम कथा के सप्तम दिवस पर भक्ति, श्रद्धा और भावनाओं का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला कि पूरा पंडाल मानो अयोध्या धाम बन गया। कथा व्यास के ओजस्वी वाणी प्रवाह के साथ जैसे ही अयोध्या वासियों द्वारा भगवान श्रीराम के भगवत दर्शन का प्रसंग आया, वातावरण “राम चन्द्र मुख चन्द्र निहारीं” जैसे अमृत वचनों से गुंजायमान हो उठा। हर श्रोता की आंखों में भक्ति की चमक और हृदय में करुणा, प्रेम व मर्यादा का सागर हिलोरें लेने लगा।

सप्तम दिवसीय कथा में भगवान श्रीराम के वनवास, अयोध्या वासियों की व्याकुलता और प्रभु दर्शन के क्षणों का ऐसा सजीव वर्णन हुआ कि श्रद्धालु भाव-विभोर होकर स्वयं को कथा का अंग अनुभव करने लगे। “राम चन्द्र मुख चन्द्र निहारीं” की व्याख्या करते हुए कथा व्यास ने बताया कि जैसे चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से जगत को शांति देता है, वैसे ही प्रभु श्रीराम का मुख-मंडल भक्तों के हृदय में करुणा, शांति और धर्म का प्रकाश भर देता है। यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि आत्मा के उद्धार का क्षण है—जहां अहंकार गलता है और भक्ति पुष्पित होती है।

कथा के दौरान अयोध्या वासियों की पीड़ा, उनका संयम और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास का मार्मिक चित्रण हुआ। जब वर्षों बाद अयोध्या वासियों को प्रभु श्रीराम के दर्शन होते हैं, तो आंखों से अश्रुधारा बह निकलती है—यह आंसू विरह के नहीं, बल्कि मिलन के आनंद के होते हैं। कथा व्यास ने कहा कि श्रीराम केवल एक पात्र नहीं, वे जीवन की मर्यादा हैं; उनका प्रत्येक आचरण हमें कर्तव्य, त्याग और सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है।

इस पावन अवसर पर गोरखपुर सहजनवा के विधायक प्रदीप शुक्ला अपनी धर्मपत्नी सुमन शुक्ला के साथ उपस्थित रहे। उनके साथ गोरखपुर ग्रामीण विधायक विपिन सिंह सहित क्षेत्र के अनेक जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और धर्मप्रेमी नागरिकों ने कथा का रसपान किया। जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और भी बढ़ा दिया। सभी ने एक स्वर में कहा कि ऐसी कथाएं समाज को जोड़ती हैं, संस्कार देती हैं और युवा पीढ़ी को सनातन मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनती हैं।

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पंडाल में बैठे श्रद्धालु कथा के प्रत्येक शब्द को मानो हृदय में उतार रहे थे। “जय श्रीराम” के उद्घोष, शंखनाद और भजनों की मधुर ध्वनि से वातावरण भक्तिमय बना रहा। महिलाएं, वृद्ध, युवा और बच्चे—सभी की आंखों में आस्था की चमक साफ दिखाई दे रही थी। कथा के बीच-बीच में प्रस्तुत भजन और रामनाम संकीर्तन ने श्रद्धालुओं को भावसमाधि में पहुंचा दिया।

कथा व्यास ने अपने संदेश में कहा कि आज के समय में श्रीराम कथा का महत्व और भी बढ़ गया है। जब समाज भौतिकता की दौड़ में उलझा है, तब श्रीराम का जीवन हमें संयम, सेवा और सत्य का मार्ग दिखाता है। अयोध्या वासियों की तरह हमें भी जीवन में धैर्य रखना चाहिए और प्रभु पर अटूट विश्वास बनाए रखना चाहिए—क्योंकि अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।

सप्तम दिवस की कथा का समापन आरती और प्रसाद वितरण के साथ हुआ। श्रद्धालु देर तक पंडाल में रुके रहे, मानो इस दिव्य अनुभूति को अपने भीतर सहेज लेना चाहते हों। गोरखपुर की यह श्रीराम कथा न केवल एक धार्मिक आयोजन रही, बल्कि यह जन-जन के हृदय को जोड़ने वाला, संस्कारों को जागृत करने वाला और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने का अनुपम अवसर बनकर सामने आई।

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