गोरखपुर
“सफलता और शांति का रहस्य अनुकूलन में छिपा होता है”: सर्वेंद्र कृष्ण
गोलाबाजार (गोरखपुर)।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा…..
हनुमान चालीसा की इन पंक्तियों में निहित दर्शन केवल आध्यात्मिक सत्य ही नहीं, बल्कि मानव व्यवहार और मनोविज्ञान का एक गहन ब्लूप्रिंट है। यह हमें सिखाता है कि सफलता और शांति का रहस्य ‘अनुकूलन’ (Adaptability) में छिपा है। मनुष्य का व्यक्तित्व एक ऐसा तरल तत्व होना चाहिए, जो पात्र के अनुसार अपना आकार बदल सके। उक्त बातें अध्यात्म पर विशेष चर्चा के दौरान सर्वेंद्र कृष्ण ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा।
उन्होंने कहा कि जब हम अपने गुरु, अभिभावक, मार्गदर्शक या मेंटोर के समक्ष होते हैं, तो हमारा ‘सूक्ष्म रूप’ हमारी पात्रता का परिचायक होता है। मनोविज्ञान कहता है कि जब अहंकार विसर्जित होता है, तभी सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। श्रद्धावान व्यक्ति एक रिक्त पात्र के समान है, जिसमें ज्ञान की वर्षा समाहित हो सकती है। यह कोमलता दुर्बलता नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय भावनात्मक बुद्धिमत्ता है। हम जिस ऊर्जा के साथ किसी संबंध में प्रवेश करते हैं, वही ऊर्जा प्रतिध्वनित होकर हमारे पास लौटती है। यदि हम समर्पण लेकर जाएंगे, तो आशीष और बोध लेकर लौटेंगे।
इसके विपरीत, जब सामना ‘लंका’ रूपी विकृतियों से हो जो हमारे भीतर काम, क्रोध और लोभ के रूप में अट्टहास कर रही हैं तब कोमलता आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। वहाँ ‘विकट रूप’ धारण करना अनिवार्य है। यह विकटता शारीरिक बल से अधिक मानसिक दृढ़ता और आत्म-अनुशासन की परिचायक है। नकारात्मक प्रवृत्तियों का दहन करने के लिए जिस कठोर निर्णय-शक्ति की आवश्यकता होती है, वह केवल एक संकल्पित चित्त से ही संभव है।
हनुमान जी द्वारा अपनी ही पूँछ की अग्नि से लंका का दहन करना ‘संसाधन प्रबंधन’ का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सूत्र हमें समझाता है कि जीवन की जटिलतम समस्याओं के समाधान अक्सर हमारे अपने ही परिवेश और आंतरिक क्षमताओं में निहित होते हैं। ‘थिंक ग्लोबल, एक्ट लोकल’ का सिद्धांत यही तो है—दृष्टि व्यापक हो, पर क्रियान्वयन स्थानीय संसाधनों और वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप हो। श्रेष्ठ जीवन वही है, जहाँ व्यक्ति यह विवेक रखे कि कहाँ उसे ‘सूक्ष्म’ होकर हृदय जीतना है और कहाँ ‘विकट’ होकर विकारों का समूल नाश करना है। यही संतुलन हमें एक सामान्य मनुष्य से उन्नत व्यक्तित्व की ओर ले जाता है।
