गोरखपुर
श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है सम्मय माता का मंदिर
भक्तों की मुराद को करती हैं पूरा
गोला बाजार (गोरखपुर)। मानव के आस्था व विश्वास से जुड़े अनगिनत पूजा स्थल सदियों से पूजित होते चले आ रहे हैं। इन स्थलों का हमारी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता से अटूट सम्बन्ध रहा है। गोला तहसील क्षेत्र के ग्राम सभा भीटी में स्थित अति प्राचीन सम्मय माता का मंदिर मानव के आशा एवं विश्वास का एक अनोखा प्रतीक है। इस माता के दरबार में पूरे वर्ष श्रद्धालु भक्त जनों का तांता बना रहता है। लेकिन नवरात्र के दिनों में एक बड़ा उत्सव जैसा माहौल बना रहता है। माँ भगवती व वैभव के प्रताप का बखान करते हुए एवं हृदय स्पर्शी गीत व घंटों का अनवरत आवाज, शंख ध्वनि मंदिर के विशाल क्षेत्र में असंख्य जन मानस का उमड़ता सैलाब सब कुछ बृहंगम दृश्य उपस्थित कर देता है। भक्तों के सारे मुराद एवं मन्नतों को सम्मय माता पूरा करा देती है।
बताते चलें कि जनपद के दक्षिणांचल में स्थित चिल्लूपार विधान सभा व गोला तहसील का सुप्रसिद्ध सम्मय माता मंदिर गोला बड़हलगंज सड़क मार्ग पर स्थित मदारिया चौराहे से तीन किमी उत्तर भीटी गांव में स्थित है। मदारिया से मंदिर जाने के लिए पिच मार्ग बना हुआ है। इतना ही नहीं माता के स्थान पर पहुँचने के लिए हाटा गोला बड़हलगंज से भी भीतर के रास्ते पिच मार्ग बने हुए हैं।
सम्मय माता का मंदिर शांति के उपासकों के लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रहा है। इस माता के मंदिर पर जनपद के अतिरिक्त सटे अन्य जनपद मऊ, आजमगढ़, देवरिया, संतकबीर नगर, कुशी नगर आदि स्थानों के श्रद्धालु भक्तों के अतिरिक्त, प्रवासी भारतीयों का भारी भीड़ वर्ष पर्यन्त माता के दरबार में दिखाई पड़ती है। भक्त गण अपने काम को पूरा होने के लिए मन्नतें मानते हैं और कार्य पूरा हो जाने पर माता के मंदिर में आकर घंटा, चुंदरी व कड़ाही चढ़ाते हैं।

क्षेत्र के हजारों गांवों के नौनिहालों का मुंडन संस्कार मंदिर परिसर में सम्पन्न होता रहता है। जन सूत्रों के अनुसार सच्चे दिल से मानी गयी मन्नतें कभी भी निष्फल नहीं जाती हैं। सम्मय माता के उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक लोक कथाएँ प्रचलित हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ आर बी पांडेय की पुस्तक गोरखपुर जनपद के अनुसार लगभग चार सौ वर्ष पूर्व हरियाणा प्रांत की भीटहा तहसील एक छोटी सी रियासत के रूप में स्थापित थी तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब ने रियासत पर आक्रमण कर रियासत को नष्ट कर दिया और रियासत के मालिक को पकड़ कर दिल्ली के निकट कारागार में बंद कर दिया। भीटहा रियासत के मालिक माता सम्मय के अनन्य भक्त थे। कारागार के बंद भक्त की पीड़ा से मर्माहत होकर सम्मय माता ने अपने दैवीय प्रभाव से जमींदार व उनके सहयोगियों को जेल से मुक्त कराकर अपने रथ में बैठाकर भीटी के सघन वन में लाकर छोड़ दिया। तभी से सम्मय माता के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी। थोड़े अंतराल के बाद सघन कानन वन में माता के प्रस्तर की मूर्ति क्षेत्रीय जनता में श्रद्धा व विश्वास का केंद्र बन गयी। लोगों की मन्नतें व इच्छाएं पल्लवित होने लगी। जनता के असीम विश्वास के चलते एक छोटा सा मंदिर का निर्माण हुआ।
देवी दुर्गा के नवे रूप में सम्मय सिद्ध दात्री के मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मेहदराव गांव निवासी समाजसेवी राजनाथ दुबे ने एक धर्मशाला का निर्माण कराया। वर्ष 2004 में चिल्लूपार विधान सभा क्षेत्र के जनप्रतिनिधि व कैबिनेट मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी ने एक जन सभा कर मंदिर के कायाकल्प कराने का संकल्प लिया। और विधायक निधि से कार्य सम्पन्न हुए आज यह मंदिर पर्यटन विभाग के मानचित्र पर अंकित है। मंदिर लगभग आठ एकड़ क्षेत्रफल में है। जिसके चारों तरफ बाउंड्री वाल बने हुए हैं। मंदिर परिसर में दस भव्य विश्रामालय, शौचालय, दर्जनों हैंड पंप व बीच में एक भव्य पोखरा स्थापित है।
सम्मय माता के इस पवित्र मंदिर परिसर में स्थित दर्जनों दुकानों में अधिकांश दुकानें मुस्लिम वर्ग की हैं। हिन्दुओं के लिए यह स्थान जहाँ श्रद्धा और आस्था का केंद्र बना हुआ है। वही मुसलमान परिवार मंदिर से लेकर श्रद्धालु भक्त गणों के सुख दुख में अपनी जोरदार हिस्सेदारी बांटते रहते हैं। और मंदिर में आयोजित समस्त कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कराते हैं। सम्मय माता का यह मंदिर धर्म व मजहब के नाम पर बंटे समाज को एक अनूठा सन्देश एकता के लिए देता खड़ा है। मन्दिर में पुजारी के रूप में बगल में स्थित पड़ौली गांव के मिश्रा परिवार है जो निरन्तर माता की सेवा, साफ सफाई व देखभाल की व्यवस्था में लगे रहते हैं। इनके ही खानदान को माता सम्मय का आशीर्वाद प्राप्त है।
