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चन्दौली

मोरारी बापू बतावें किस शास्त्र में वर्णित है कि मरने पर सूतक नहीं लगता

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चंदौली। मोरारी बापू ने अपने वक्तव्य में कहा कि वे निम्बार्क सम्प्रदाय के साधु हैं, जिसमें समाधि होने पर ही सब कुछ समाप्त हो जाता है, सूतक नहीं लगता। तो इस पर हम यह जानना चाहते हैं कि निम्बार्क सम्प्रदाय के किस ग्रंथ में गृहस्थ व्यक्ति को सूतक न होने का वर्णन है? निम्बार्क सम्प्रदाय एक वैदिक सम्प्रदाय है, तो वह कैसे अनैतिक कृत्य की छूट किसी को दे सकता है? राजा, ब्रह्मचारी और यति को सूतक नहीं लगता, इसके अतिरिक्त अन्य सभी के लिए सूतक हमारे हिन्दू धर्मशास्त्र में कहा गया है।

उक्त बातें परमाराध्य परमधर्माधीश ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती जी महाराज ने कही।

अब निम्बार्क सम्प्रदाय की है जिम्मेदारी
निम्बार्क सम्प्रदाय में मरण शौच नहीं लगता, ऐसा मोरारी बापू जी ने अपने वक्तव्य में कहा है। अब यह जिम्मेदारी निम्बार्क सम्प्रदाय के लोगों की भी है कि वे इस बात को स्पष्ट करें।

खुलासा करें बापू
मोरारी बापू जी ने कथा में कहा कि हमारे पास भी शास्त्र हैं और खुलासा कर सकते हैं। तो इस पर हम यह कहना चाहते हैं कि वे खुलासा करें कि जो उन्होंने कहा है, उस वक्तव्य की पुष्टि किस शास्त्र वाक्य से होती है।

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सिन्दूर की परवाह नहीं
सूतक काल में मोरारी बापू के मानस सिन्दूर कथा कहने पर कहा गया कि मोरारी बापू जी की धर्मपत्नी आजीवन उनके लिए सिन्दूर लगाती रही, पर उसके मृत्यु हो जाने पर दस दिन सूतक का पालन नहीं करने वाले क्या सिन्दूर का मान रख रहे हैं?

प्रसिद्ध व्यक्ति की अधिक जिम्मेदारी बनती है
उन्होंने कहा कि यह मात्र एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं है। जब कोई सामान्य व्यक्ति ऐसा करे तो उसकी उपेक्षा की जा सकती है, पर कोई प्रसिद्ध व्यक्ति जब शास्त्रविरुद्ध कृत्य करता है तो लोग अनुकरण करने लगते हैं। शास्त्रविरुद्ध आचरण कदापि अनुकरणीय नहीं हो सकता।

राम के अनुयायी राम के विरुद्ध आचरण कैसे कर सकते हैं
उन्होंने आगे कहा कि जिन राम भगवान की बापू जी कथा कहते हैं, उन राम भगवान के जीवन में धर्मशास्त्र ही प्रमुख था। धर्मशास्त्र का अर्थ ही है वेद और स्मृति। भगवान राम जी का एक भी आचरण वेदविरुद्ध नहीं रहा, तो उनकी कथा करने वाले बापू जी कैसे वेदविरुद्ध आचरण कर सकते हैं?

मंदिर में धार्मिकों का प्रबन्धन होता तो ऐसा कभी न होता
उन्होंने कहा कि विश्वनाथ मंदिर का प्रशासन धर्म की अवहेलना कर रहा है। यदि यहाँ की व्यवस्था किसी धार्मिक व्यक्ति के अधीन होती तो ऐसा अधर्म वहाँ पर नहीं हो सकता था। इसीलिए कहा जाता है कि धर्म का कार्य धार्मिकों की देख-रेख में होना चाहिए। जो लोग मंदिर का दर्शन कर रहे हैं, उनको भी दोष लग रहा है क्योंकि इस कृत्य के बाद मंदिर का शुद्धिकरण नहीं हुआ है।

बापू जी से हमारा कोई द्वेष नहीं
शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि मोरारी बापू जी से हमारा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है, परन्तु यह हमारा दायित्व है कि जहाँ भी शास्त्र का लोप हो रहा है, उसके सुधार के लिए सचेत करें। क्योंकि जब शास्त्र की अवहेलना होती है तो व्यक्ति को न तो सिद्धि मिलती है और न सुख मिलता है।

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शंकराचार्य जी के मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय जी ने बताया कि शंकराचार्य जी महाराज का इस सन्दर्भ का सम्पूर्ण वक्तव्य 1008.guru यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है।

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