सियासत
पुण्यतिथि पर विशेष : डॉ. रघुनाथ सिंह ने कभी भी सांसद का नहीं लिया वेतन, जानें और भी रोचक बातें
वाराणसी से तीन बार सांसद की आज 32 वीं पुण्यतिथि
क्या आज के युग में किसी सांसद से यह अपेक्षा की जा सकती है की वह सांसद का वेतन न ले। लेकिन इसी बनारस शहर में भी एक ऐसे सांसद हुए हैं जिन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार संसद सदस्य चुने जाने के बावजूद एक रुपया वेतन नहीं लिया। वाराणसी से प्रथम तीन बार सांसद रहे डॉ. रघुनाथ सिंह की आज 32 वीं पुण्यतिथि है। रोहनिया के खेवली भतसार गाँव में एक भूमिहर परिवार में सन् 1910 में उनका जन्म हुआ था।उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पहले एमए फिर एलएलबी की पढ़ाई की। वे पीएचडी और डी लिट भी थे ।इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस की। वह सन् 1952,1957 और 1962 में वाराणसी से सांसद चुने गये। उन्होंने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया और 1926, 1930 और 1942 के आंदोलन में जेल गये।

सांसद बनने के बाद इन्होंने तीन बार मंत्री पद ठुकराया। उनका मानना था कि मंत्रिपद सरकारी नौकरी जैसा है ।इस पद पर रहते वे देश की सेवा नहीं कर पायेंगे। यहाँ तक की वह स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन और सांसद का वेतन भी नहीं लेते थे। एक ज़मींदार परिवार में जन्म लेने और तमाम सुख सुविधा के बावजूद वे रिक्शे से चलते थें।यहाँ तक कि रिक्शे पर दूसरी सवारी बैठाने की छूट भी देते थें। उनके घर इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, चौधरी चरण सिंह जैसे राजनेताओं का आना-जाना लगा रहता था। बनारस के औरंगाबाद मुहल्ले में इनका निवास स्थान था। इन्होंने महात्मा गांधी की प्रेरणा से सोनिया तालाब पर नमक का क़ानून तोड़ा था। इस पर सामने की सड़क का नामकरण सत्याग्रह मार्ग पड़ा। वे सादगी और सरलता की जीती जागती मिसाल थे। उन्होंने कभी भी सरकारी सुविधाओं का उपभोग नहीं किया।
उन्हें 1968 में जिंक लिमिटेड का चेयरमैन बनाया गया और फिर 1977 में शिपिंग कॉर्पोरेशन के चेयरमैन बनें।लेकिन दोनों ही ओहदों पर वे मात्र एक रुपया वेतन लेते थें। वे कहते थें कि, उनके वेतन से ज़्यादा देश को पैसों की ज़रूरत है। वे सरकारी गाड़ी का उपयोग नहीं करते थें। डॉ रघुनाथ सिंह ने अनेक पुस्तकें लिखी जो ज़्यादातर हिन्दी में थीं। एक पुस्तक अंग्रेज़ी में भी लिखी। आज के नेताओं को उनसे प्रेरणा लेने की ज़रूरत है।
