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गोरखपुर

पंचायत चुनाव की अनिश्चितता से गोरखपुर में थमी दावेदारों की रफ्तार, बदला गांवों का सियासी मिजाज

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तारीख और आरक्षण पर संशय, पंचायत राजनीति में सुस्ती

गोरखपुर। पंचायत चुनाव को लेकर बीते वर्ष दिसंबर तक गांवों में जोश अपने चरम पर था। संभावित दावेदार लगातार गांवों का दौरा कर रहे थे और ऐसा माहौल बना हुआ था मानो जल्द ही मतदान की तिथि घोषित होने वाली हो। कोई धार्मिक यात्राओं का आयोजन कर रहा था तो कोई क्रिकेट और कबड्डी टूर्नामेंट के जरिए युवाओं को आकर्षित करने में जुटा था। कहीं दावतों की धूम थी तो कहीं मांगलिक कार्यक्रमों और तेरहवीं तक में ‘सेवा’ के नाम पर खुलकर खर्च किया जा रहा था।

लेकिन जैसे ही ब्लाक से लेकर जिला मुख्यालय और सत्ता के गलियारों में यह चर्चा तेज हुई कि पंचायत चुनाव समय पर होंगे या टल सकते हैं, पूरे माहौल पर असर पड़ गया। चुनाव की तारीखों, आरक्षण और परिसीमन को लेकर बनी अनिश्चितता ने दावेदारों की सक्रियता पर ब्रेक लगा दिया। जिन हाथों से कुछ समय पहले तक लिफाफे भारी रहते थे, वही हाथ अब मजबूती से मुट्ठी बांधे नजर आने लगे हैं।

भटहट ब्लाक के बरगदहीं चौराहे पर पहले सुबह-शाम दावेदार बैनर-पोस्टर के साथ ‘जनता की सेवा’ में सक्रिय दिखाई देते थे। लेकिन चुनाव की तिथि आगे खिसकने की चर्चाओं के बाद ये चेहरे धीरे-धीरे गायब हो गए। जंगल हरपुर, जैनपुर, जंगल डुमरी नंबर दो, बैलों जैसे गांवों में भी यही स्थिति है। पहले जो दावेदार हर कार्यक्रम में सबसे आगे रहते थे, अब उनकी मौजूदगी बेहद कम हो गई है।

बड़ी ग्राम पंचायतों में हालात और दिलचस्प हो गए हैं। सीट का आरक्षण किस वर्ग के खाते में जाएगा, इसे लेकर पिछड़ा, अनारक्षित और अनुसूचित वर्ग के दावेदारों के बीच आपसी बातचीत और समझौते चल रहे हैं। कुछ पंचायतों में ‘अगर सीट मेरी नहीं हुई तो तुम्हारा समर्थन’ जैसे वादे चर्चा का विषय बने हुए हैं। दावेदार मानते हैं कि आरक्षण स्पष्ट होते ही गठबंधन की राजनीति तेज हो जाएगी।

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बड़हलगंज ब्लाक के बैरियाखास, कोयलीखाल, कोड़र नीलकंठ, मुहालजलकल, पटनाघाट और ओझौली, गोला ब्लाक के भरसी बुजुर्ग, कोहड़ी बुजुर्ग, रकौली, अबरुस और देवारीबारी समेत अन्य क्षेत्रों में पहले खर्च को लेकर होड़ मची रहती थी। अब वही दावेदार शांत हैं और कई तो नजर भी नहीं आ रहे। यही स्थिति कैंपियरगंज, ब्रह्मपुर, सहजनवा, खजनी समेत जिले के सभी 20 ब्लाकों की पंचायतों में देखने को मिल रही है।

गांवों में चर्चा है कि फिलहाल दावेदार राजनीति से कुछ दूरी बनाकर अपने पुराने कारोबार और धंधों की ओर लौट गए हैं। चुनाव की स्थिति साफ होने के बाद ही उनमें फिर से सक्रियता आने की उम्मीद है। फिलहाल पंचायत राजनीति इंतजार के मोड़ पर ठहर गई है, जहां उत्साह से ज्यादा हिसाब-किताब और रणनीति पर ध्यान दिया जा रहा है।

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