पूर्वांचल
चंदौली में इस बार त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना
केंद्रीय मंत्री डॉ महेंद्र नाथ पांडे के खिलाफ वीरेंद्र सिंह होंगे राजपूत चेहरा
मौर्य प्रत्याशी के बल पर बसपा करेगी खेल
चंदौली लोकसभा सीट के लिए भाजपा, सपा और बसपा ने अपने उम्मीदवारों का नाम घोषित कर दिया है। भाजपा में दो बार के सांसद रहे केंद्रीय मंत्री डॉ महेंद्र नाथ पांडे पर बीजेपी ने जहां तीसरी बार भरोसा जताया है। वहीं सपा ने राजपूत चेहरे के रूप में उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह को टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा है। वीरेंद्र सिंह के दम पर सपा राजपूत को साधने की कोशिश कर रही है। इससे इतर बसपा ने भाजपा के ही पुराने फार्मूले को अपनाते हुए सत्येंद्र कुमार मौर्य को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाया है। वैसे भी चंदौली लोकसभा सीट पर क्षत्रिय और मौर्य मतदाताओं की संख्या को देखते हुए इस बार त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना व्यक्त की जा रही है।

उतार-चढ़ाव से भरा रहा डॉक्टर महेंद्र नाथ पांडे का राजनीतिक सफर – छात्र राजनीति के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहारे सक्रिय राजनीति में आने वाले डॉक्टर महेंद्र नाथ पांडे भाजपा के इस समय बड़े नेताओं में शुमार हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के विश्वास पात्र भी माने जाते हैं। पार्टी संगठन में माहिर डॉक्टर महेंद्र नाथ पांडे को 2024 में पीएम नरेंद्र मोदी की वाराणसी लोकसभा सीट से सटे चंदौली से चुनाव मैदान में उतारा गया है। इसी सीट से उन्हें 2019 के बाद 2024 में भी भाजपा ने मौका दिया है। मोदी के दोनों कार्यकाल में मंत्री बनाए जाने के साथ ही डॉक्टर महेंद्र नाथ पांडे को प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व की जिम्मेदारी दी गई थी।
राजपूत वोट मतों के बिखराव से बढ़ सकती है डॉक्टर पांडे की मुश्किलें -चंदौली लोकसभा सीट पर नजर डाली जाए तो 2019 का मुकाबला काफी संघर्षपूर्ण रहा। डॉक्टर महेंद्र नाथ पांडे को महज 13,000 वोटो से जीत मिली थी। जबकि 2014 में उन्होंने बसपा के अनिल मौर्य को डेढ़ लाख से अधिक वोटो से हराया था। इस सीट पर राजपूत वोटरों की संख्या को देखते हुए इस बार सपा ने बड़ा दांव खेला है।
दो बार के विधायक और प्रदेश के मंत्री रह चुके वीरेंद्र सिंह को टिकट देकर सपा ने चुनाव को रोचक बना दिया है। वीरेंद्र सिंह 1996 और 2003 में विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। मुलायम सिंह सरकार के गठन में उनकी बड़ी भूमिका रही और इसी आधार पर उन्हें सरकार में मंत्री पद दिया गया था। वीरेंद्र सिंह के मैदान में आने के बाद से सबसे बड़ी चुनौती भाजपा उम्मीदवार के लिए भी मानी जा रही है।

चंदौली की राजनीति को समझने वाले बच्चन सिंह का कहना है कि, इसमें कोई दो राय नहीं है। राजपूत मतों को साधने के लिए ही सपा ने वीरेंद्र सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। महेंद्र नाथ पांडे का काम बहुत बेहतर नहीं रहा है। सपा के वीरेंद्र ने लड़ाई को रोचक बना दिया है।
बसपा के मौर्य प्रत्याशी के आने से दो तरफ घिरी भाजपा -बच्चन सिंह का कहना है कि, सपा के बाद भाजपा को गिराने के लिए बसपा ने भी बड़ा दांव खेला है। भाजपा के मजबूत वोट बैंक में सेंधमारी की योजना के तहत बसपा ने सत्येंद्र मौर्य को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर मौर्य वोटरों का काफी प्रभाव है। सत्येंद्र चंदौली लोकसभा के तहत वाराणसी के अजगरा विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले हैं। बसपा के आंदोलन से जुड़े रहे हैं और पार्टी के कई पदों पर भी काम कर चुके हैं। वह बसपा प्रमुख मायावती की नीतियों के लंबे समय से समर्थन रहे हैं।
भाजपा के आनंद रत्न मौर्य ने लगाई थी हैट्रिक -चंदौली संसदीय सीट पर मौर्य वोटरों के प्रभाव से इसी बात से समझा जा सकता है कि भाजपा के आनंद मौर्य रत्न ने जीत की हैट्रिक लगाई थी। 1991 से 1998 तक लगातार तीन बार भाजपा के सांसद रहे हैं। 1999 के लोकसभा चुनाव में लगातार चौथी बार भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़े थे। लेकिन आनंद रत्न को सपा के जवाहरलाल जायसवाल से हार का सामना करना पड़ा। मौर्य वोटरों के प्रभाव को देखकर बसपा ने सत्येंद्र को मौका दिया है।
बसपा ने 2014 में अनिल मौर्य को दिया था टिकट -इससे पहले बसपा ने 2014 के चुनाव में ही मौर्य वर्ग पर दांव खेला था। मायावती ने पूर्व विधायक अनिल मौर्य को टिकट दिया था लेकिन वह चुनाव हार गए थे। बसपा में उनकी नंबर दो की पोजीशन थी। 2019 में गठबंधन के तहत यह सीट सपा के खाते में गई थी।
सपा को यादव वोट बैंक के साथ दलितों से भी उम्मीद -इस सीट पर सर्वाधिक वोट बैंक यादवों का है। अगर राजपूत यादव और मुस्लिम वोट सध गया तो तो सपा बल्ले-बल्ले हो सकती है। बसपा की रणनीति है कि दलित मौर्य और दूसरे अति पिछड़े साथ आए तो आसानी से यह सीट मिल सकती है। इधर भाजपा की नीति और 10 साल के काम का तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ ही महेंद्र नाथ पांडे पर भरोसा है।
