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गोरखपुर

एचआरपी की पहचान और प्रबंधन से कम किया जाएगा मातृ एवं शिशु मृत्यु दर

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सीएमओ कार्यालय में हुआ जिला स्तरीय प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण

गोरखपुर। उच्च जोखिम गर्भावस्था (एचआरपी) की समय से पहचान और उचित प्रबंधन कर जिले में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम किया जाएगा। इसी उद्देश्य से मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के प्रेरणा श्री सभागार में बुधवार को जिला स्तरीय प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षित लोग ब्लॉकों पर एएनएम और सीएचओ को प्रशिक्षित करेंगे। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ राजेश झा ने बताया कि इस कदम का लक्ष्य मातृ मृत्यु दर को शून्य तक ले जाना है।

सीएमओ डॉ झा ने बताया कि यदि गर्भावस्था के दौरान ही जोखिम कारकों की पहचान कर ली जाए, तो प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं को 80% तक कम किया जा सकता है। यह सुनिश्चित करने के लिए अब जमीनी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे गर्भवती की पहली एएनसी जांच के दौरान ही यह पहचान सकें कि वह सामान्य गर्भवती है या फिर एचआरपी। अगर एचआरपी का चिन्हीकरण समय से हो जाता है तो उन्हें उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्रों  पर संदर्भित कर सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित किया जा सकता है।

सीएमओ ने कहा, “मातृ स्वास्थ्य हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। हर माँ की जान कीमती है। इस प्रशिक्षण के माध्यम से हम अपनी रेफरल प्रणाली को मजबूत कर रहे हैं। जब हमारे ब्लॉक स्तरीय अधिकारी और फिर एएनएम-सीएचओ दक्ष होंगे, तभी हम हर हाई-रिस्क केस को ट्रैक कर पाएंगे और समय पर हस्तक्षेप कर मातृ मृत्यु की दुखद घटनाओं को रोक सकेंगे।”

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डॉ झा ने बताया कि प्रशिक्षण का आयोजन यूनिसेफ और आईआईएचएमआर दिल्ली के सहयोग से किया गया। प्रशिक्षुओं का बताया गया कि एनीमिया (खून की कमी), उच्च रक्तचाप और मधुमेह तथा पूर्व में हुए जटिल प्रसव जैसी स्थितियों वाली महिलाओं को एचआरपी श्रेणी में रखा जाता है। ऐसी गर्भवती को विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। प्रशिक्षण का उद्देश्य इस विशेष प्रबंधन को ही सुनिश्चित कराना है।

इस अवसर पर एसीएमओ आरसीएच डॉ एके चौधरी, जिला मातृ स्वास्थ्य परामर्शदाता डॉ सूर्य प्रकाश, यूनिसेफ के मंडलीय स्वास्थ्य समन्वयक विजेंद्र चौबे, आईआईएचएमआर दिल्ली की टीम से सूर्य प्रकाश शर्मा, कुंदन विश्वकर्मा, अभिलाषा दुबे एवं अमन ने प्रशिक्षण के विभिन्न सत्रों में प्रशिक्षुओं को महत्वपूर्ण जानकारी दी।

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