Connect with us

गोरखपुर

ऋतुराज बसंत का हुआ आगाज : सर्वेदु कृष्ण

Published

on

Loading...
Loading...

गोलाबाजार (गोरखपुर)। शिशिर की जड़ता जब अपनी अंतिम सांसे ले रही होती है और प्रकृति की शिराओं में एक मौन प्रतीक्षा पसरी होती है, तभी सुदूर क्षितिज से एक सूक्ष्म, मादक स्पंदन सुनाई देता है। यह आहट है..ऋतुराज वसंत की। वह वसंत, जो धरा की धमनियों में नवजीवन का उल्लास बनकर दौड़ता है और आशाओं के सुरभित निर्झर प्रवाहित कर देता है। यह केवल ऋतुचक्र का परिवर्तन भर नहीं करता अपितु चराचर जगत में ‘चैतन्य’ का शंखनाद कर जाता है।

धूसर पड़ चुके वृक्षों की कोख से जब रक्तिम कोंपलें फूटती हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो वसुंधरा ने विरक्ति का त्याग कर पूर्ण श्रृंगार का संकल्प ले लिया हो। अमराइयों में कोकिल की विरह-कूक जब पंचम स्वर को छूती है और  जब सरसों के खेतों में स्वर्णमयी आभा लहराती है, तब प्रकृति की यह चित्रवीथि साक्षात् काव्य बन जाती है। यहां रंग भी हैं, राग भी है और वह गंध भी, जो मन के वातायनों को खोल देती है। यह वह संधि-काल है जहां जड़ता विदा लेती है और कोमल हरियाली के रूप में जीवन का नवोन्मेष प्रस्फुटित होता है।

भारत की सांस्कृतिक मेधा में वसंत का यह उत्सव और भी गहन और उदात्त हो जाता है, जब यह वसंत पंचमी के पावन रूप में विद्या, कला और वाणी की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है। प्रकृति का यह बाह्य सौंदर्य तब अंतस की शुद्धि का मार्ग बन जाता है। जहाँ पुष्पों में पराग का संचार होता है, वहीं मानव मन में वीणावादिनी की कृपा से विवेक और सृजन का अवतरण होता है। यह पावन पर्व इस सत्य का उद्घोष है कि प्रकृति का यह नव-परिवर्तन तभी पूर्ण है, जब हमारे विचारों में मौलिकता और शब्दों में माधुर्य का वास हो।

वसंत पंचमी का आध्यात्मिक पक्ष यही है कि यह ऋतु केवल कामदेव के बाणों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह ‘कुंदेंदु तुषार हार धवला’ (सरस्वती) के श्वेत प्रकाश में धुल कर पवित्र हो जाती है।

आज जब चहुंओर मलयज समीर का स्पर्श अनुभव हो रहा है, तब यह अनिवार्य है कि हम केवल बाहर के पीले फूलों की छटा ही न देखें, बल्कि अपने भीतर की जड़ता को भी विसर्जित करें।

Advertisement

इस नवआरंभ की आत्मा को आत्मसात करें और ज्ञान की उस पुनीत ज्योति को प्रज्वलित करें, जो जीवन को मंगलमय, रसमय और जीवंत बना दे।

Copyright © 2024 Jaidesh News. Created By Hoodaa

You cannot copy content of this page