गोरखपुर
बांसगांव में श्रीमद्भागवत कथा का भावपूर्ण समापन, हवन के साथ गूंजा भक्ति का अमृत
गोरखपुर। जनपद के बांसगांव क्षेत्र में चल रही सप्तम दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आज दिनांक 6 फरवरी 2026, दिन शुक्रवार को विधिवत हवन कार्यक्रम के साथ भावपूर्ण समापन हो गया। 31 जनवरी 2026 से प्रारंभ हुई इस पावन कथा ने पूरे क्षेत्र को भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया। कथा के प्रत्येक दिन भव्य, मनमोहक झांकियों और संगीत मय प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं के मन को भाव-विभोर कर दिया।

इस दिव्य आयोजन में कथा व्यास आचार्य पंडित अरविंद प्रताप मिश्र के श्रीमुख से निकली अमृतवाणी ने श्रोताओं को धर्म, भक्ति और जीवन मूल्यों की गहराई से अनुभूति कराई। उनके साथ उपस्थित विशिष्ट विद्वानों के सानिध्य ने कथा को और भी ज्ञानवर्धक तथा प्रेरणास्पद बना दिया। कथा स्थल पर प्रतिदिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती रही, जहां महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और युवा सभी भक्ति रस में डूबे दिखाई दिए।
इस श्रीमद्भागवत कथा के यजमान मंगलम प्लाईवुड के प्रोपराइटर श्रवण कुमार जायसवाल ने सपरिवार आयोजन कर अपने पूजनीय पिता को भागवत कथा का रसपान कराने का सौभाग्य प्राप्त किया। उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत भगवान की कथा पारलौकिक है, जिसे जितना भी सुना जाए मन तृप्त नहीं होता। यह कथा मनुष्य के अंतर्मन को शुद्ध कर भगवान के प्रति भाव और विश्वास को और अधिक दृढ़ करती है।

कथा के दौरान श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग जब मंच से प्रस्तुत हुआ, तो पूरा पंडाल भक्ति और आनंद से झूम उठा। रुक्मिणी के अखंड प्रेम, उनकी विरह वेदना और श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी हरण का भावपूर्ण चित्रण सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। झांकियों में सजे श्रीकृष्ण के स्वरूप और रुक्मिणी के मंगल गीतों ने विवाह उत्सव को जीवंत कर दिया, मानो द्वारका स्वयं बांसगांव में उतर आई हो।

वहीं सुदामा चरित्र के वर्णन ने कथा को करुणा और विनम्रता की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया। बाल सखा सुदामा की निर्धनता, उनके निष्कपट हृदय और श्रीकृष्ण की सखा वत्सलता ने यह संदेश दिया कि भगवान अपने भक्त के भाव देखते हैं, वैभव नहीं। जैसे ही सुदामा के चरणों को श्रीकृष्ण ने धोया, कथा स्थल पर उपस्थित हर श्रोता भावुक हो उठा और “जय श्रीकृष्ण” के उद्घोष से वातावरण गूंज उठा।
समापन दिवस पर हवन कार्यक्रम में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच आहुतियां दी गईं और क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति एवं कल्याण की कामना की गई। अंत में प्रसाद वितरण के साथ कथा का समापन हुआ। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान रहा, बल्कि समाज को भक्ति, सेवा और सद्भाव का संदेश देने वाला एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक पर्व बन गया।
