गाजीपुर
संतान सुख की कामना लिए श्रद्धालुओं ने किया स्कंदमाता पूजन
बहरियाबाद (गाजीपुर) जयदेश। बहरियाबाद एवं आस -पास के ग्रामीण अंचलों के मंदिरों में नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंद माता की पूजा पाठ कर हर्षोल्लास के साथ किये। भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण ‘स्कंदमाता’ कहलाती हैं। देवी का यह स्वरूप वात्सल्य और शक्ति का अद्भुत संगम है।
देवी ‘सिंह’ पर सवार रहती हैं। उनकी गोद में भगवान स्कंद (कार्तिकेय) अपने बाल रूप में विराजमान रहते हैं। देवी की चार भुजाएं हैं। दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से उन्होंने स्कंद को पकड़ा हुआ है और नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में है और नीचे वाली भुजा में भी कमल का पुष्प है। देवी कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं, इसलिए उन्हें ‘पद्मासना’ भी कहा जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नाम के राक्षस ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसकी मृत्यु केवल शिव पुत्र के हाथों ही होगी। उस समय शिव जी सती के वियोग में तपस्या में लीन थे। देवताओं के अनुरोध पर शिव और पार्वती का मिलन हुआ और कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ। कार्तिकेय को युद्ध के लिए तैयार करने और उन्हें ममता व शक्ति प्रदान करने के लिए माता ने यह स्वरूप धारण किया। मां स्कंदमाता ने ही अपने पुत्र को असुरों से लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया, जिसके बाद कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया।
जो दंपति संतान सुख की कामना रखते हैं, उनके लिए स्कंदमाता की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। देवी की कृपा से भक्त के लिए मोक्ष के द्वार खुलते हैं और मन को परम शांति प्राप्त होती है।इनकी पूजा करने से बाल रूप कार्तिकेय की पूजा स्वतः ही हो जाती है, जिससे ज्ञान और शौर्य की प्राप्ति होती है। मां स्कंदमाता को केले का भोग अति प्रिय है। इसके अलावा उन्हें केसरिया रंग की मिठाइयां भी अर्पित की जाती हैं। इस दिन सफेद या रॉयल ब्लू (नीला) रंग पहनना शुभ माना जाता है, जो शांति और ऊर्जा का प्रतीक है।पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना फलदायी होता है। सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
