गाजीपुर
मृत्यु क्यों आवश्यक है, क्योंकि मृत्यु के कारण ही इस संसार में प्रेम है – संतवाणी
नंदगंज (गाजीपुर)। संसार में हर कोई मृत्यु से डरता है। लेकिन जन्म और मृत्यु सृष्टि के नियम हैं। यह ब्रह्मांड के संतुलन के लिए अति आवश्यक होता है। इसके बिना मनुष्य एक-दूसरे पर हावी हो जाते। इसे एक कहानी के द्वारा समझा जा सकता है।
एक बार एक राजा एक संत के पास गया। जो राज्य के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठे थे। राजा ने पूछा, हे स्वामी! क्या कोई औषधि है जो अमरता दे सके। यदि हां तो कृपा कर मुझे बताइये।
तब संत ने कहा कि हे राजन! आपके सामने जो दो पर्वत हैं, उन्हें पार कीजिए। वहाँ एक झील मिलेगी। उसका पानी पीने से आप अमर हो जाएंगे। राजा यह सुनकर बहुत खुश हुआ।
राजा ने पर्वत पार करके झील पा गया। लेकिन जैसे ही वह झील का पानी पीने को झुका तभी उसे कराहने की आवाज सुनी। आवाज का पीछा करने पर राजा एक बूढ़े और कमजोर व्यक्ति को दर्द में देखा।
राजा ने उससे कारण पूछा, तो उस व्यक्ति ने कहा कि “मैंने इस झील का पानी पी लिया और अमर हो गया हूं। जब मेरी उम्र सौ साल की हुई तो मेरे बेटे ने मुझे घर से निकाल दिया। मैं पचास साल से बिना किसी देखभाल के यहाँ पड़ा हूँ। मेरा बेटा मर चुके है और मेरे पोते अब बूढ़े हो चुके हैं। मैंने खाना- पीना बंद कर दिया है, फिर मैं भी जीवित हूँ।
राजा ने सोचा कि बुढ़ापे के साथ अमरता का क्या फायदा? अगर मैं अमरता के साथ यौवन भी प्राप्त कर सकूँ तो अच्छा रहेगा। यह सोचकर राजा वापस संत के पास आये और पूछा कि कृपया आप मुझे अमरता के साथ यौवन प्राप्त करने का उपाय बताइये।
तब संत ने शांत मन से कहा कि झील पार करने के बाद, आपको एक और पर्वत मिलेगा।उसे पार करेगे तो और एक पेड़ मिलेगा। जिस पर पीले फल लगे होंगे। उन फलों में से एक खा लीजियेगा। तब आपको अमरता के साथ यौवन भी मिल जाएगा।
राजा आनंद से झूमते हुए झील के आगे दूसरा पर्वत पार किया और एक पेड़ देखा, जिस पर पीले फल लगे थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने फल तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो उन्हें तेज बहस और लड़ाई की आवाजें सुनाई दीं। तब राजा ने सोचा कि इस सुनसान जगह में कौन झगड़ सकता है? उधर जाकर राजा ने देखा कि चार जवान आदमी ऊंची आवाज़ में आपस में झगड़ रहें हैं। राजा ने पूछा कि तुम लोग क्यों झगड़ रहे हो?
उनमें से एक आदमी बोला, “मैं 250 साल का हूँ और मेरे दाहिने वाले व्यक्ति की उम्र 300 साल है। वह मुझे मेरी संपत्ति का हिस्सा नहीं दे रहा। जब राजा ने दाहिने वाले व्यक्ति से पूछा कि क्यों नहीं दे रहो हो। उस आदमी ने कहा कि मेरा पिता, जो 350 साल का है, अभी भी जीवित है और उसने मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया। तो मैं अपने बेटे को कैसे दूं?
तब उस आदमी ने अपने 400 साल के पिता की ओर इशारा करते वही शिकायत की। उन्होंने राजा से कहा कि संपत्ति के इस अंतहीन झगड़े की वजह से गांव वालों ने उन्हें गांव से बाहर निकाल दिया है। राजा हैरान होकर संत के पास वापस लौटे और बोले, धन्यवाद संत जी आपने मुझे मृत्यु के महत्व को भली- भांति समझाया।
तब संत ने कहा कि मृत्यु के कारण ही इस संसार में प्रेम है। मृत्यु के बारे में चिंता करने के बजाय, हर दिन और हर पल को खुशी से जियो। खुद को बदलो तो भी दुनिया बदल जाएगी। जैसे जब आप स्नान करते समय भगवान का नाम लेते हैं तो वह एक पवित्र स्नान बन जाता है। जब आप खाना खाते समय नाम लेते हैं, तो वह भोजन प्रसाद बन जाता है। जब आप चलते समय नाम लेते हैं, तो वह एक तीर्थ यात्रा बन जाती है। जब आप खाना पकाते समय नाम लेते हैं, तो वह भोजन दिव्य बन जाता है। जब आप सोने से पहले नाम लेते हैं, तो वह ध्यानमय नींद बन जाती है और जब आप काम करते समय नाम लेते हैं, तो वह भक्ति बन जाती है। इसी प्रकार जब आप घर में नाम लेते हैं, तो वह घर मंदिर बन जाता है। राजा नतमस्तक होकर अपने नगर लौट जाते हैं।
