वाराणसी
भारतीय अस्मिता की संजीवनी बनी श्रीराम कथा, काशी में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
वाराणसी में तारक सेवा संस्था, अंतरराष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान अयोध्या तथा वृंदावन शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय अस्मिता की संजीवनी: श्रीराम कथा” विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन रथयात्रा स्थित स्वस्तिक सिटी सेंटर के शगुन बैंक्विट हॉल में संपन्न हुआ।
दो सत्रों में आयोजित इस संगोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए डेढ़ दर्जन से अधिक साहित्यकारों को अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
मुख्य अतिथि डॉ. दयाशंकर मिश्र दयालु ने अपने संबोधन में कहा कि श्रीराम कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है क्योंकि यह सत्य, धर्म, न्याय, प्रेम, त्याग और कर्तव्य जैसे शाश्वत मानवीय मूल्यों की शिक्षा देती है और आधुनिक जीवन की जटिल परिस्थितियों में नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करती है। उन्होंने काशी की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यही वह भूमि है जहां तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की और भगवान राम का आदर्श चरित्र आज भी समाज के लिए प्रेरणा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. बल्देव भाई शर्मा ने कहा कि राम केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने योग्य मूल्य हैं और आज के समय में मनुष्यता को बचाने के लिए राम का समन्वय आवश्यक है। संगोष्ठी में विभिन्न विद्वानों ने श्रीराम कथा के सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक पक्षों पर विचार रखे।
आयोजन के दौरान इशान घोष को तन्मय साधक सम्मान और डॉ. अखिलेश मिश्र रामकिंकर को आचार्य पं. राजपति दीक्षित स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। साथ ही “हिंदुत्व”, “अनसुने स्वर, अनकही भक्ति”, “पर्यावरणीय चेतना” और “मंडूक स्तवन” पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ। दूसरे सत्र में ऑनलाइन माध्यम से कई देशों के वक्ताओं ने भारतीय जीवन मूल्यों में श्रीराम कथा की वैश्विक प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए।
