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वाराणसी

भगवान स्वयं प्रकृति स्वरूप हैं, प्रकृति की रक्षा करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य : संत रामानुज वैष्णवदास

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वाराणसी। मिर्जामुराद क्षेत्र के प्रतापपुर ग्राम स्थित शिव मंदिर प्रांगण में सर्वकल्याणार्थ आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर कथा व्यास पूज्य संत श्री रामानुज वैष्णवदास जी महाराज ने श्रद्धालुओं को प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया।


उन्होंने कहा कि संपूर्ण सृष्टि भगवान का ही स्वरूप है और भगवान स्वयं प्रकृति पुरुष हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य के भीतर प्रकृति के प्रति समर्पण और संरक्षण की भावना होना अनिवार्य है। मानव योनि सहित 84 लाख योनियों का पालन-पोषण प्रकृति के सहारे ही संभव है। नदियां, पर्वत, वृक्ष, जल और वायु सभी प्रकृति के पोषक तत्व हैं, जो समस्त जीवों के जीवन का आधार हैं। इनकी रक्षा करना हम सभी का परम नैतिक कर्तव्य है।

संत श्री रामानुज वैष्णवदास जी महाराज ने कहा कि मनुष्य को आत्ममंथन करना चाहिए कि उसने प्रकृति को क्या दिया। उन्होंने कहा—


“जड़ चेतन गुण दोषमय, विश्व किन्ह करतार,

हम मानव भी संसार में ही हैं,

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हमारे भीतर भी गुण-दोष हो सकते हैं।”

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दोष भी यदि लोककल्याण के लिए हो तो वह पूजनीय बन जाता है, जैसे भगवान शिव ने जगत कल्याण के लिए विषपान किया और आज भी पूजनीय हैं। जो व्यक्ति अपने परिवार और समाज के लिए त्याग करता है, वह साधारण नहीं होता। कथा के दौरान उन्होंने श्रोताओं को प्रेरित करते हुए कहा कि मानव जीवन का परम लक्ष्य मानव कल्याण होना चाहिए।

बीच-बीच में संगीतमय संकीर्तन और भगवान श्री कृष्ण के जयकारों से पूरा पंडाल गुंजायमान रहा। इस अवसर पर रुद्र प्रकाश सिंह, बृजेश यादव, आशू मिश्रा, अजय कुमार सिंह, बबलू सिंह, बच्चा सिंह, बच्चा पांडे, निरंकार सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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