चन्दौली
नवरात्र के दूसरे दिन श्रीपति बम्ह बाबा मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

सकलडीहा (चंदौली)। कस्बा से सटे ईटवा गांव स्थित श्रीपति बम्ह बाबा मंदिर पर नवरात्र के दूसरे दिन सोमवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तों ने बाबा का जलाभिषेक, हवन और दर्शन-पूजन कर सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान मंदिर परिसर में मेले जैसा दृश्य देखने को मिला।
300 वर्ष पुरानी कथा से जुड़ा है मंदिर
ईटवा गांव का यह मंदिर ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व रखता है। करीब 300 वर्ष पूर्व इस गांव में छत्तर सिंह नाम के एक राजा रहते थे, जिनका भव्य महल था। उसी गांव में श्रीपति दुबे नाम के एक ब्राह्मण भी रहते थे, जिनके पास बड़ी संख्या में भैंसें थीं। एक दिन उनकी भैंसें राजा के खेत में चली गईं, जिससे क्रोधित होकर राजा के सैनिकों ने उन सभी को जब्त कर लिया। जब श्रीपति दुबे को इस बात का पता चला, तो वे राजा के दरबार पहुंचे और अपनी भैंसों को छोड़ने की विनती की।

अनशन और राजा की जिद
राजा ने भैंसें छोड़ने से मना कर दिया। श्रीपति दुबे ने फिर सिर्फ अपनी भूरी भैंस को मांगा, क्योंकि वे उसी का दूध पीते थे। राजा ने संदेह किया कि आखिर इस भूरी भैंस में क्या खास है, और उसने केवल उसी भैंस को न छोड़ने का फैसला किया। इससे आहत होकर श्रीपति दुबे ने महल के दरवाजे के पास अन्न-जल त्याग कर अनशन शुरू कर दिया।
राजा की पुत्री और श्रीपति दुबे का बलिदान
इस दौरान राज दरबार में कार्यरत ताजपुर निवासी हुलास पाण्डेय ने राजा से दुबे जी के लिए भूरी भैंस छोड़ने का अनुरोध किया, लेकिन राजा ने उन्हें दरबार से निकाल दिया। धीरे-धीरे श्रीपति दुबे की तबीयत बिगड़ने लगी और 21 दिन बाद वे अचेत हो गए। तब राजा की पुत्री ने उनके मुख में दूध डाल दिया। दुबे जी ने “लड़कियों की जय हो और लड़कों की क्षय हो” का उद्घोष कर प्राण त्याग दिए।
गांव में क्षत्रियों का निवास निषेध
हुलास पाण्डेय के वंशज प्रेम पाण्डेय के अनुसार, ईटवा गांव के रकबे में कोई क्षत्रिय मकान नहीं बना सकता और न ही यहां निवास कर सकता है। यह परंपरा आज भी बनी हुई है और गांव में क्षत्रियों का निवास निषेध है।