सियासत
छुपा रुस्तम साबित होंगी मायावती ?
टिकट वितरण में जातीय समीकरण को साधा दोनों गठबंधनों को झटका देने की तैयारी
बसपा प्रमुख मायावती ने आगामी लोकसभा चुनाव में सारे पूर्वानुमानों को धता बता दिया है। कहा तो यह कहा जा जा रहा था कि बसपा का टिकट दरअसल बीजेपी ही बाँटेगी और कहां मायावती ने इस बार न सिर्फ़ भतीजे आकाश आनंद को लांच कर दिया बल्कि टिकट वितरण से दोनों गठबंधनों की नींद उड़ा दी है। पूर्वांचल में 2024 का चुनाव इस बार काफ़ी दिलचस्प होने जा रहा है।इसकी वजह हैं बसपा प्रमुख। सबसे ज़्यादा परेशान एनडीए है।मायावती ने एक ख़ास रणनीति के तहत पूर्वांचल की अनेक सीटों पर ऐसे उम्मीदवार उतार दिए हैं जिससे लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है।

उदाहरणस्वरूप चंदौली सीट को लें। यहाँ से वर्तमान सांसद महेंद्र नाथ पांडेय हैं। वे पिछला चुनाव 14 हज़ार के मामूली अंतर से जीते थे। क्योंकि तब सपा और बसपा गाँठबंधन था। सपा ने इस बार पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह को टिकट दिया तो मायावती ने सतेंद्र मौर्य को उतार दिया। चंदौली में मौर्य वोट अच्छी ख़ासी तादात में हैं। आनन्द रतन मौर्य बीजेपी से तीन बार संसद रह चुके हैं। अगर इस बार मौर्य वोट मायावती के साथ गये तो दलित और मौर्य मिलकर नया गुल खिला सकते हैं।

इसी तरह घोसी संसदीय क्षेत्र पर नज़र डालें तो मायावती ने पूर्व सांसद बालाकृष्ण चौहान को उतार दिया है। बीजेपी ने फागू चौहान को राज्यपाल और दारा सिंह चौहान को मंत्री बना कर चौहान वोट को अपने पाले में करने की जो चाल चली थी उसकी मायावती ने काट खोज ली। यहाँ से एनडीए गठबंधन से ओमप्रकाश राजभर के पुत्र अरविंद राजभर और सपा से राजीव राय चुनाव लड़ रहे हैं। चौहान वोटों में बिखराव का सीधा फ़ायदा सपा को होने के क़यास लगाए जा रहे हैं।

इसी तरह आजमगढ़ में मायावती ने भीम राजभर को मैदान में उतार दिया है। पिछले चुनाव में राजभर समुदाय ने बीजेपी उम्मीदवार निरहुआ का साथ दिया था और सपा के धर्मेंद्र यादव 9 हज़ार के मामूली अंतर से चुनाव हारे थे।इस बार निरहुआ और धर्मेंद्र यादव फिर आमने सामने हैं। ऐसे में राजभरों का वोट किस करवट जाएगा देखने वाली बात होगी। यहां क़रीब 70 हज़ार राजभर वोट हैं।

अब चलते हैं ग़ाज़ीपुर। यहाँ मायावती ने उमेश सिंह तो टिकट देकर बीजेपी ख़ेमे में खलबली मचा दी है। उमेश सिंह जाति से ठाकुर हैं। पिछले चुनाव में ठाकुर मतदाताओं ने बीजेपी के मनोज सिन्हा को वोट दिया था। यह अलग बात है यादव मुस्लिम दलित समीकरण के चलते बसपा से अफजाल अंसारी चुनाव जीत गये थे। अब देखने वाली बात होगी कि दलित और ठाकुर किधर जाते हैं। बीजेपी ने पारस नाथ राय तो सपा ने अफजाल को पुनः टिकट दिया है।

मायावती ने जौनपुर से पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को टिकट देकर सबको आश्चर्य में डाल दिया है। अगर दलित और कुशवाहा साथ हो गये तो कुछ भी हो सकता है । पिछली बार श्याम सिंह यादव बसपा से चुनाव जीते थे।इस बार बीजेपी ने पूर्व कांग्रेसी कृपा शंकर सिंह को मैदान में उतारा है।

प्रधानमंत्री के क्षेत्र वाराणसी से मायावती ने मुस्लिम प्रत्याशी अतहर जमाल लारी को उतार कर इंडिया गठबंधन को तगड़ा झटका दिया है। अब तक माना जा रहा था कि मुस्लिमों का वोट थोक भाव से कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय को जाएगा। लेकिन मायावती ने बनारस में लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सीधा फ़ायदा बीजेपी प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को हो सकता है।
इस तरह देखा जाये तो मायावती ने प्रत्याशी चयन में जातीय समीकरण को साध का इस लोकसभा चुनाव में भी अपने को प्रासंगिक बनाए रखा है। पिछली लोकसभा में बसपा से दस सांसद थे। इस बार कितने आयेंगे यह चार जून को पता चलेगा। विधानसभा में बसपा के एक मात्र विधायक उमाशंकर सिंह हैं।
