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गोरखपुर

गोरखपुर में SIR प्रक्रिया पर उठे सवाल, तीन ग्राम सभाओं के 165 मतदाताओं के नाम कटने से हंगामा

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मतदाता सूची संशोधन में पंचायत मित्र, सफाई कर्मचारी व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को बीएलओ बनाने पर विवाद

गोरखपुर। जनपद की ग्राम सभा साखडाड पांडेय और उससे जुड़ी ग्राम सभाओं में चल रही SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया अब लोकतंत्र की जड़ों पर सवाल खड़े कर रही है। तीन ग्राम सभाओं को मिलाकर 165 वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से कट जाना न केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है, बल्कि इसे लोग लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला हनन बता रहे हैं। ग्रामीणों में आक्रोश इस कदर है कि अब यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों में भी खलबली मचाने लगा है।

जानकारी के अनुसार ग्राम सभा सेमरडाडी में 92, साखडाड पांडेय में 34 और महिलवार में 39 मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। ये वे लोग हैं जो वर्षों से मतदान करते आ रहे हैं, जिनके नाम 2003 के SIR में भी दर्ज थे, फिर आज ऐसा क्या बदलाव सरकार चाहती है कि अपने ही मतदाताओं को व्यवस्था के गर्त में ढकेला जा रहा है? यही सवाल अब हर चौपाल और बैठक में गूंज रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि इस बार SIR जैसी अत्यंत संवेदनशील जिम्मेदारी पंचायत मित्र, सफाई कर्मचारी और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को बीएलओ बनाकर सौंप दी गई, जिन्हें न तो मतदाता सूची संशोधन की समुचित जानकारी थी और न ही कानूनी प्रक्रिया की समझ। लोगों का कहना है कि जिनके हाथ में लोकतंत्र की नींव सौंपी गई, वे स्वयं अपने दायित्वों से अनभिज्ञ रहे, जिसका खामियाजा आज आम जनता भुगत रही है।

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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नाम कटने की इस प्रक्रिया को लेकर अब जाति और पार्टी आधारित चर्चाएं तेज हो गई हैं। गांवों में खुलकर कहा जा रहा है कि “ब्राह्मण भाजपा, यादव सपा और हरिजन बसपा” जैसी सोच के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए गए। भले ही यह आरोप हों, लेकिन जब बड़ी संख्या में एक साथ नाम कटते हैं तो संदेह गहराना स्वाभाविक है। यदि समय रहते स्थिति नहीं संभाली गई, तो यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा राजनीतिक विस्फोट बन सकता है।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार बीएलओ और संबंधित अधिकारियों के चक्कर लगाए, लेकिन न तो स्पष्ट जवाब मिला और न ही कोई ठोस समाधान। जिन लोगों ने वर्षों तक वोट डालकर सरकारें बनाईं, आज वही लोग खुद को बेबस और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि यदि 2003 के SIR में सब कुछ ठीक था, तो आज वही मतदाता “अयोग्य” कैसे हो गए?

यह पूरा मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, प्रशिक्षण की कमी और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। SIR जैसी प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना होता है, न कि लोकतंत्र से लोगों को बाहर करना। यदि यही हाल रहा, तो जनता का विश्वास चुनावी व्यवस्था से उठना तय है।

अब देखना यह है कि प्रशासन और चुनाव आयोग इस गंभीर मामले पर कितनी गंभीरता दिखाते हैं। क्या 165 मतदाताओं के साथ हुए इस घोर अन्याय को सुधारा जाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? फिलहाल इतना तय है कि SIR ने गांव-गांव में राजनीतिक भूचाल ला दिया है, और इसकी गूंज जल्द ही बड़े राजनीतिक मंचों तक सुनाई देगी।

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