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चन्दौली

क्या देर से पहुँचने पर छात्र को परीक्षा से रोकना न्याय है : डॉ. विनय प्रकाश तिवारी

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चंदौली। समय पर पहुँचना अनुशासन है, यह हम सब जानते हैं। लेकिन क्या हर देरी लापरवाही होती है? क्या हर देर से पहुँचा छात्र गैरज़िम्मेदार होता है? यही सवाल दिल को छूता है, जब हम किसी परीक्षा केंद्र के बाहर खड़े उस विद्यार्थी की कल्पना करते हैं, जिसकी साँसें तेज़ चल रही हैं, आँखों में घबराहट है, माथे पर पसीना है, और हाथ जोड़कर वह सिर्फ एक बात कह रहा है “सर, मुझे बैठने दीजिए… मैंने पूरे साल पढ़ाई की है।”

परीक्षा सिर्फ तीन घंटे का कागज़ नहीं होती। वह 365 दिनों की मेहनत होती है। सुबह जल्दी उठकर पढ़ना, दोस्तों की मौज छोड़ना, मोबाइल से दूरी, परिवार की उम्मीदें, शिक्षकों का भरोसा — ये सब मिलकर उस परीक्षा हॉल तक पहुँचते हैं। एक छात्र जब डेस्क पर बैठता है, तो वह सिर्फ उत्तर नहीं लिखता, वह अपने भविष्य की दिशा लिखता है।

लेकिन कई बार ज़िंदगी घड़ी देखकर नहीं चलती। ट्रैफिक जाम हो जाता है, बस खराब हो जाती है, ट्रेन लेट हो जाती है, अचानक तबीयत बिगड़ जाती है, घर में कोई आपात स्थिति आ जाती है। क्या हम यह मान लें कि वह छात्र जानबूझकर देर से आया? क्या कोई बच्चा, जिसने साल भर मेहनत की हो, जानबूझकर अपना ही साल बर्बाद करेगा?

अधिकतम परीक्षा समय तीन घंटे होता है। लेकिन जब वह छात्र किसी तरह दौड़ते-भागते परीक्षा केंद्र तक पहुँच गया, तो जो समय बचा है, वही उसका समय है। मान लीजिए वह इतना लेट हुआ कि उसके पास सिर्फ पाँच मिनट बचे। तो क्या वे पाँच मिनट भी उसके नहीं हैं? वे पाँच मिनट उसकी मेहनत के हैं, उसके सपनों के हैं, उसके आत्मसम्मान के आख़िरी सहारे हैं। उसे कम समय मिलेगा, उसका पेपर अधूरा रह सकता है, उसके अंक कम आ सकते हैं — यह सब उसका अपना नुकसान है। लेकिन उसे परीक्षा से पूरी तरह बाहर कर देना, यह व्यवस्था द्वारा दिया गया अतिरिक्त दंड है।

ज़रा उस दृश्य को महसूस कीजिए — गेट के अंदर खाली सीटें हैं, प्रश्नपत्र रखे हैं, घड़ी चल रही है। गेट के बाहर एक बच्चा खड़ा है, आँखों में पानी, आवाज़ काँपती हुई। अंदर जगह है, व्यवस्था है, पर नियम के नाम पर दरवाज़ा बंद है। परीक्षा केंद्र को क्या नुकसान है अगर वह बैठ जाए? न कुर्सी टूटती है, न कागज़ फटते हैं, न भवन हिलता है। लेकिन उसे रोक देने से एक साल टूट जाता है। उसका आत्मविश्वास टूटता है। कई बच्चे अंदर ही अंदर खुद को असफल मानने लगते हैं, अवसाद में चले जाते हैं।

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नियम ज़रूरी हैं, पर नियमों का उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना है, भविष्य छीन लेना नहीं। देर से आया छात्र पहले ही सज़ा भुगत रहा है — समय कम है, दबाव ज़्यादा है, परिणाम अनिश्चित है। यह प्राकृतिक दंड है। लेकिन उसे लिखने का अवसर ही न देना, यह मानवीयता से दूर लगता है। नियम इंसान के लिए बने हैं, इंसान नियम के लिए नहीं।

जब कोई छात्र गेट पर खड़ा होता है, तो सिर्फ वह अकेला नहीं खड़ा होता। उसके साथ खड़ी होती है उसकी माँ की दुआ, पिता की मेहनत, परिवार का त्याग, शिक्षक का विश्वास और उसका अपना भविष्य। उस पल एक शब्द उसकी पूरी दुनिया बदल सकता है “अंदर आओ” या “एंट्री बंद है।”

देर से पहुँचना गलती हो सकती है, परिस्थिति की मार हो सकती है, लेकिन अवसर छीन लेना अन्याय जैसा महसूस होता है। अगर वह केंद्र तक पहुँच गया है, तो उसे बैठने दीजिए। समय कम दीजिए, रिपोर्ट बनाइए, लेट मार्क कीजिए पर उसकी कलम मत रोकिए। कभी-कभी पाँच मिनट भी पूरे साल की मेहनत का सम्मान होते हैं।

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