गोरखपुर
औद्योगिक राख से कराहता सहजनवा, जिम्मेदार बने मूकदर्शक
गोरखपुर। सहजनवा नगर, जो कभी हरियाली, स्वच्छ हवा और शांत जीवन के लिए जाना जाता था, आज औद्योगिक राख के साए में कराह रहा है। नगर के समीप स्थापित स्टील फैक्टरी से प्रतिदिन निकलने वाली भारी मात्रा में राख ने यहाँ के जनजीवन को नारकीय बना दिया है। यह राख केवल ज़मीन पर नहीं गिरती, बल्कि लोगों के फेफड़ों, आँखों, भोजन और भविष्य पर भी परत-दर-परत जमती जा रही है।
स्टील फैक्टरी की चिमनियों से उड़ती महीन राख हवा के साथ पूरे नगर में फैल जाती है। सुबह-सुबह जब लोग अपने घरों के दरवाज़े खोलते हैं, तो आंगन, छत, पानी की टंकियाँ, कपड़े—सब पर धूसर राख की चादर बिछी मिलती है। यह राख इतनी सूक्ष्म होती है कि साँस के साथ भीतर चली जाती है और धीरे-धीरे दमा, खाँसी, एलर्जी, आँखों में जलन और त्वचा रोगों को जन्म देती है। बच्चों की मासूम साँसें सबसे पहले इसकी शिकार बनती हैं, बुज़ुर्गों के लिए यह राख एक धीमा ज़हर सिद्ध हो रही है। किसान वर्ग की पीड़ा और भी गहरी है। खेतों पर गिरने वाली राख मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रही है। फसलें झुलस रही हैं, पत्तियाँ काली पड़ जाती हैं और पैदावार घटती जा रही है।
पशुओं के चारे में मिलकर यही राख उनके स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रही है। दूध उत्पादन घट रहा है, पशु बीमार हो रहे हैं, और किसान लाचार होकर सब कुछ सहने को विवश है। नगर की गृहिणियाँ सबसे अधिक रोज़मर्रा की त्रासदी झेल रही हैं। साफ़ किए गए बर्तन कुछ ही देर में फिर राख से भर जाते हैं। धुले कपड़े सूखने से पहले ही गंदे हो जाते हैं। पीने के पानी में राख की मिलावट लोगों को भीतर तक असुरक्षित कर रही है।
सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि इस भयावह स्थिति के बावजूद प्रशासन मौन है। शिकायतें दर्ज होती हैं, ज्ञापन दिए जाते हैं, परंतु कार्रवाई शून्य है। न प्रदूषण नियंत्रण के मानकों की सख़्ती से निगरानी होती है, न फैक्टरी प्रबंधन को जवाबदेह ठहराया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो आम जन की पीड़ा प्रशासनिक फाइलों के नीचे दबकर दम तोड़ रही हो।
यह निष्क्रियता केवल उदासीनता नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का प्रमाण है। विकास के नाम पर सहजनवा के लोगों के स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन के अधिकार की बलि दी जा रही है। प्रशासन और उद्योग के बीच मौन समझौता आम नागरिक को अकेला और असहाय छोड़ देता है।
सहजनवा के लोग आज सवाल कर रहे है— क्या विकास की कीमत साँसों से चुकानी होगी? क्या राख में लिपटा यह नगर कभी फिर से खुली हवा में साँस ले पाएगा? जब तक प्रशासन अपनी नींद से नहीं जागेगा और प्रदूषण फैलाने वालों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सहजनवा यूँ ही राख के नीचे दबकर कराहता रहेगा।
पहले भी नगर पंचायत के लोगों ने औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को पत्र देकर अवगत करा चुके है। अगर प्रशासन द्वारा समय रहते इस पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो एक बड़ी त्रासदी के शिकार हो सकते है , सहजनवा के नागरिक।
